Book Review

कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ (समीक्षा)

दिनेश गुप्ता ‘दिन’ जी का मेल मिला कि उनकी नयी कविता संग्रह, “कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ” जल्द ही पाठकों के समक्ष हाज़िर हो रही है और मैं भी इस संग्रह के बारे में अपने विचार सभी तक पहुंचाऊं। जल्द ही यह पुस्तक मेरे हाथों में थी और श्रृंगार से भरी इस रसभरी संग्रह का हमने पान किया और आपके समक्ष इसका स्वाद ले कर हाज़िर हैं।

सबसे पहले आपको बता दूं कि दिनेश गुप्ता पेशे से सॉफ्टवेर इंजिनियर हैं पर लिखने के शौक और जुनून ने इनको अपनी तीसरी किताब प्रकाशित करने पर मजबूर कर दिया है। इससे पहले ‘मेरी आँखों में मोहब्बत के मंज़र हैं’ और ‘जो कुछ भी था दरमियाँ’ भी प्रकाशित हो चुकी हैं। इस युवा कवि की एक प्रशंसनीय कोशिश है इनकी यह तीसरी किताब, ‘कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ’।

‘मेरी आँखों में जिसका अक्स है, मुझसे कितना दूर वो शख्स है’

इन सुन्दर पंक्तियों से दिल का दर्द बयां कर देते हैं ‘दिन’ और अपने अन्दर छुपे दर्द को शब्दों की लहरों में बहा देते हैं।

आज के दौर के प्यार को कुछ इन शब्दों में बयां कर रहे हैं ‘दिन’:

उड़ानें इतनी ऊँची हो गयी कि ज़मीं से नाता टूट गया,
इतनी बुलंदी पर आ पहुँचे कि हर अपना छूट गया,
मुहब्बत किताबों में अच्छी थी, जो आज़माने की भूल कर बैठे,
तिनका-तिनका, ज़र्रा-ज़र्रा, कतरा-कतरा लुट गया।।

किस तरह आज का युवा अपने रिश्तों और अपनी पेशेवर तरक्की के दरमियाँ जूझ रहा है, वह इन पंक्तियों से झलक जाती है। जहाँ एक ओर हम आज के युवा का ज़मीन से ना जुड़े होने का झंडा फहराते हैं वहीँ ऐसे युवा लेखक आज के दौर में भी क्रियात्मक और भावनात्मक होने के प्रमाण दे रहे हैं अपनी लेखनी से, अपने शब्दों से।

कजरे की धार लिखूँ या फूलों वाला हार लिखूँ मैं,
लबों की शोखी लिखूँ मैं या आँखों का इकरार लिखूँ मैं,
इस रीते तन-मन से, अधूरे-अकेले खाली पन से,
कैसे नवयौवन-मधुवन का सारा श्रृंगार लिखूँ मैं।।

इन सुन्दर शब्दों की लड़ी पिरोकर श्रृंगार रस को और सुन्दर बना रहे हैं ‘दिन’

अपनी कई कविताओं का संकलन इस पुस्तक में प्रस्तुत करके दिनेश गुप्ता ‘दिन’ ने युवा श्रृंगार कवियों को न केवल एक बेहतरीन संग्रह प्रदान किया है पर और खूबसूरत लिखने का हौसला भी दिया है। अपने कार्य के साथ-साथ अपनी जान, लेखन को भी जारी रख कर ‘दिन’ ने सभी को प्रोत्साहित किया है जिसके लिए अनेक शुभकामनाएं।

किताब को प्रकाशित किया है ‘ऑथर्स इन्क इंडिया’ ने पर एक मलाल मुझे ज़रूर हो रहा है कि पुस्तक का सम्पादन शत-प्रतिशत नहीं हुआ है और मैंने कई जगह वर्तनियों में गलतियाँ पाई हैं। अगर पुस्तकें गलत छापेंगी तो हिन्दी के गिरते स्तर में उत्थान कहाँ से आएगा? फॉर्मेटिंग और सम्पादन में मेरे ख्याल से अभी काफी सुधार की गुंजाइश है और इश्वर से प्रार्थना है कि इसका दूसरा संस्करण छपे और उसमें इन सभी गलतियों को सुधारा जाए।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस युवा श्रृंगार कवि को आप पढना चाहेंगे। किताब के बारे में और जानकारी के लिए देखें:
Web: http://dineshguptadin.in/
FB: https://www.facebook.com/dineshguptaofficial
Youtube: https://www.youtube.com/watch?v=tCKCnxwAwfc
Email: dinesh.gupta28@gmail.com

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मेरी सोच, समाज, India

बड़ा शहर vs अपना शहर

एक शहर है, बहुत विशाल, लोगों से भरा, लोगों से डरा, मकानों से पटा, सटा-सटा। ये शहर ‘बड़ा शहर’ है। एक है इसका उलट, छोटा सा, आधे घंटे में एक छोर से उस छोर, कम लोग, नीचे मकान, खाली सड़कें, बिलकुल विपरीत, ‘छोटा शहर’

मस्त, अपना शहर vs व्यस्त बड़ा शहर (चित्र साभार गूगल)

अभी मैं बड़े शहर का बाशिंदा हूँ, या यूँ कहें कि यहाँ एक मुसाफिर हूँ। हाँ मुसाफिर ही कहूँगा। यह एक बस स्टॉप की तरह है। भीड़-भाड़, गन्दगी, दहशत, संदेहास्पद मुसाफ़िर और लोगों का आना जाना। यहाँ पर शहर का लोगों पर ज़ोर है। उसी के हिसाब से लोग चलते हैं। लोगों को शहर का खौफ़ है। वो शहर जो खुद तो अदृश्य है पर लोगों पर हुकूमत चलाता है, भगवान की तरह?

मेरे जैसे मुसाफ़िर जो छोटे शहरों को अपना दिल बेच चुके हैं, उनको यह बस स्टॉप कभी पसंद नहीं आ सकता। यहाँ लोग दौड़ते-भागते रहते हैं, मुझे तो लोगों को ठहरे हुए देखने की आदत है, उनके चहरे को पढ़ने की आदत, उनके भावों को समझने की आदत, उनसे बतियाने की आदत, उनके साथ चाय पीने की आदत। ये आदत बड़े शहरों में ख़राब हो गई है। कोई रुकता ही नहीं है जिसको मैं समझ सकूं, जो मुझे समझ सके। कोई रुकता नहीं है ५ मिनट के लिए जिससे दोस्ती कर सकूँ, जिसके साथ चाय पी सकूँ। यहाँ लोग चाय कॉफ़ी पर तभी मिलते हैं जब उन्हें कोई काम निकलवाना होता है। छोटे शहरों में जब कोई काम नहीं होता तो चाय पर मिल जाते हैं, अक्सर हर शाम।

बड़े शहरों में ऊँची ऊँची दीवारें है। घरों और दिलों, दोनों के बीच। न तुम मुझे जानते हो, न मैं तुम्हें। “क्या तुम मेरे पड़ोस में पिछले १ साल से रह रहे हो? कभी गौर नहीं किया।” ये आम वाक्य है लोगों के। छोटे अपने शहर में कोई एक दिन के लिए भी अनजान नहीं रहता। मैं अपने मोहल्ले में सबको नाम से जानता हूँ, पहचानता हूँ। वहाँ अभी भी पैसों के लिए अनजान नहीं होते हैं। अभी कुछ समय पहले बड़े शहर में मेरे नीचे तल्ले के बाशिंदे की तबियत ख़राब हुई थी। मुझे पूरे एक हफ्ते बाद दरबान से पता चला कि वो अस्पताल में भरती हैं। अब जा कर मिलने में भी संकोच हो रहा है। कुछ चीज़ें समय निकलने के बाद करनी मुश्किल हो जाती हैं। अपने शहर में छींक आने पर भी ५ लोग पूछ लेते हैं कि क्या दवा-पानी चल रहा है और नसीहत इतनी दे जाते हैं कि बिमारी से ज़्यादा नसीहतों का डर लगने लगता है। बड़े शहर के कई मुसाफिर कहते हैं कि “यहाँ ठीक है, कोई परेशान नहीं करता अपनी नसीहतों से।” पर सच तो यह भी है कि आदमी को मरे हुए ३ दिन निकल जाते हैं और दुर्गन्ध से ही पता चलता है कि वो तो गया। ३ दिन के अंतर और नसीहतों के समंदर के बीच फैसला ऐसी घटनाओं से ही हो जाता है।

मैंने कभी अपने शहर में लोगों को हर दिन ऐसे भागते हुए नहीं देखा कि मानों पागल कुत्ता पीछे पड़ा हो। वैसे कभी-कभार कुत्ते पीछे पड़ जाते हैं तो भागना पड़ता है। बड़े शहरों में मैंने मुसाफिरों को हर दिन केवल भागते ही तो देखा है। बसों में, ट्रेनों में, ट्रकों में, मेट्रो में, गाड़ियों में, बाईकों में, सब तरफ लोगों के बीच एक ऐसी अनकही-अदृश्य दौड़ है जिसका अंत किसी को नहीं पता और न ही इस दौड़ का कोई विश्लेषण कर पाया है। मेट्रो के दरवाज़ों के खुलते ही लोग बैलून में से हवा निकलने की प्रक्रिया को हुबहू नक़ल करते हैं। ऐसा लगता है कि वो निर्जीव मेट्रो भी अब इनके निकलने पर सांस ले पा रहा है। हर तरफ अफरा-तफरी मची हुई है। कोई किससे भिड़ रहा है, कोई किससे लड़ रहा है। किसी के केश अगर किसी के हाथों को छू जाए तो लात-घूँसे चल जाते हैं। ये मुसाफिर वही लोग हैं जो छोटे शहरों से हैं। क्योंकि उन्होंने कभी इतनी भीड़ को झेला नहीं होता है तो यहाँ आ कर बौरा जाते हैं। अपने शहर में मैं केवल परिचितों से भिड़ता हूँ, यदा-कदा बाज़ार में। कभी किसी अनजान से भिड़ गया तो भी एक हँसी से बात आई-गई हो जाती है।

बड़े शहरों में लोग कमाने आते हैं पर खुद को बेच देते हैं। अपना शरीर, अपना ज़मीर। कईयों को तो इसके लिए मुँह-माँगे दाम भी नहीं मिलते हैं। अपने शहर में लोग इतनी आसानी से बिकाऊ नहीं होते हैं क्योंकि वहाँ समाज की पकड़ मज़बूत है, उसका डर है, उसकी नज़र है। बड़े शहर में समाज को तड़ीपार कर दिया गया है। यहाँ समाज बन ही नहीं सकता क्योंकि यहाँ दीवारें बहुत ऊँची हैं और ऊँची दीवारों से तो आजतक बँटवारा ही हुआ है। नहीं?

बड़े शहर के लोग हर दिन चीखते चिल्लाते हैं, शोर मचाते हैं पर दिक्कत ये है कि हर कोई अपनी शोर मचा रहा है। कोई सुनने वाला ही नहीं है। यही कारण है कि लोग दुखी हैं। उनके दुःख को वो किसे सुनाएँ? मेरे शहर में चीखने चिल्लाने की नौबत नहीं आती। संतुष्ट लोगों को सुनने की आदत ज्यादा होती है। किसी एक को सुनने के लिए हजारों कान हैं। यहाँ संतुष्टि है तो शान्ति है। वहाँ शोर है तो अशांति है।

मैं तो यहाँ सिर्फ मुसाफ़िर ही बन कर रहना चाहता हूँ। मैं कभी इस बड़े शहर को ‘अपना’ शहर नहीं कह पाऊँगा। अगर यहाँ जन्मता-बढ़ता तो शायद ऐसा हो पाता। मुझे अपने शहर पहुँचना है। वहाँ से निकला तो हूँ पर वहीँ वापस पहुँचने के लिए। कैसी अजीब विडम्बना है ये ज़िन्दगी।

वैसे एक सच तो यह भी है कि शहर किसी का नहीं होता। न मेरा न तुम्हारा। वह तो मूक दर्शक की भांति सबको देखता-तकता रहता है और मंद-मंद मुस्कुराता रहता है कि कैसे बेवकूफ है यहाँ के लोग जो उसे अपना कहते हैं जबकि वह उनके रुदन पर कभी नहीं रोता है, उनकी ख़ुशी में कभी नहीं हँसता है। पर एक सत्य यह भी है कि ज़िन्दगी को पार करने के लिए एक ऐसा सहारा चाहिए जो बस इस सफ़र तक हमारा हो। एक शहर को अपना कहकर आदमी के दिल को ठंडक मिल जाती है और उसका सफ़र थोड़ा कम कष्टदायक हो जाता है।

चलिए निकलता हूँ एक रिश्तेदार से मिलने। आज का पूरा दिन इसी मिलने के नाम है। अपने शहर में तो हम अपने सभी रिश्तेदारों से दिन में दो बार मिल आते हैं। ये बड़ा शहर मुझे कभी रास नहीं आया।

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मसाला चाय, हिन्दी, Divya Prakash Dubey, Terms & Conditions Apply

मसाला चाय | Terms & Conditions Apply | किताब समीक्षा

“दिव्य प्रकाश दुबे”, एक ऐसा नाम है जो नए प्रभावशाली युवा हिन्दी लेखकों में अपना नाम शुमार करवा चुके हैं। इनकी दो किताबें, “मसाला चाय” और “Terms & Conditions Apply” अब तक छप चुकी है और हिन्द युग्म ने इन पुस्तकों को प्रकाशित किया है। आज दोनों किताबों के बारे में साथ ही बात करेंगे।

मैं किसी भी किताब के बारे में एक ऐसी सोच पेश करने की कोशिश करता हूँ जो कि एक सामान्य पाठक सोचता हो। यह नहीं कह सकता कि कितना सफल होता हूँ पर सोच की दिशा उसी तरफ रहती है। मैं, ना ही कोई समीक्षक हूँ और ना ही बड़ा लेखक, इसलिए इस ब्लॉग पर प्रकाशित सभी विचार मेरे निजी हैं और इन्हें अन्यथा किसी तरह न लें 🙂

“मसाला चाय” और “Terms & Conditions Apply” दोनों करीब करीब एक सी किताबें हैं जिसमें हिंगलिश का पुरज़ोर प्रयोग हुआ है। हिन्दी लेखन में वैसे तो मैं ‘हिंगलिश’ का हिमायती नहीं हूँ क्योंकि मैं इसे भाषा में भ्रष्टाचार मानता हूँ पर लेखक ने शायद इस ख्याल से यह किताबें लिखी हैं कि आज कि जो युवा बोलचाल भाषा है, जो कि ना ही शुद्ध हिन्दी है और ना ही शुद्ध अंग्रेजी है, को लेखन में इस्तेमाल किया जाए जिससे युवा पाठक अपने आप को इन किताबों के साथ जोड़कर देख सके। शायद यह प्रयोग सफल भी रहा है और, और भी कई किताबें इन्हीं पदचिन्हों पर चलते हुए आज पाठक-बाज़ार में प्रवेश कर चुकी हैं। तो पाठक अभिविन्यस्त (oriented) दृष्टि से देखें तो यह एक बढ़िया प्रयोग है पर भाषा की शुद्धता और उच्चता पर विचार करें तो उसमें संशय हो आता है।

दोनों ही किताबों ने कई छोटी-बड़ी कहानियों का एक पुलिंदा पेश किया है और सभी बेहद रोचक और आपको अपने अन्दर समेटने वाली हैं। क्योंकि यह युवाओं को ध्यान में रखते हुए लिखी गयी कहानियाँ हैं, इसलिए ये इस तबके को तुरंत पसंद आएगी। इन कहानियों के पात्र हमारे ही इर्द गिर्द छोटे-बड़े शहरों में बसते हैं। शायद कोई कहानी आपकी अपनी भी हो, शायद आपके किसी दोस्त कि या फिर अखबार में पढ़े किसी खबर की, पर हैं ये हमारी ही। कई कहानियाँ जो छोटे शहरों की हैं आपको आपके अतीत में ले जाएँगी और वो अल्हड़ दिन याद दिला देंगी। छोटे शहरों में चुप्पी में जीती ये कहानियों को आवाज़ दी है इन किताबों ने तो बड़े शहर के युवाओं की आम ज़िन्दगी को भी बहुत ही सरल शब्दों और विचारों में पेश किया है दिव्य प्रकाश दुबे जी ने।

इस बात पर भी ज़ोर देना चाहूँगा कि ये दोनों किताबें ऐसी हैं जिनको चाहे आप बार बार पढ़ें पर हमेशा नई सी लगेगी वैसे ही जैसे जब भी आप अपने ख़ास दोस्तों से मिलते हैं तो नए नए से लगते हैं। ये कथाएँ आपकी दोस्त हैं क्योंकि ये आप ही के बीच की हैं, आपकी हैं।

संपूर्णतः कहूँ, तो मुझे ये दोनों किताबें बेहद आकर्षक लगी क्योंकि हल्का-फुल्का पढ़ने का भी अपना ही मज़ा है वरना प्रेमचंद, निराला, इत्यादि तो हम बचपन से ही पढ़ते आये हैं 🙂

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भारत, मेरी सोच, युवा, लघु कथा, समाज, Young

सुनो, अरे सुनो!

साभार: गूगल

राहुल मेरी-आपकी तरह एक आम आदमी, नौकरी करता है, घर आता है, घर चलाता है और फिर अगले दिन शुरू हो जाता है. अपने पितृगाँव से दूर है पर घर पर सब खुश हैं कि लड़का अपना अच्छा ओढ़-बिछा रहा है और घर की गाड़ी चला रहा है. अभी राहुल की शादी नहीं हुई है पर कार्य प्रगति पर है.

हमारी ही तरह राहुल भी सोशल मीडिया का भोगी है, आसक्त है. जो करता है, वहाँ बकता है. लोगों को लगता है कितना बोलता है, हर बात यहाँ खोलता है. कभी फेसबुक तो कभी ट्विटर तो कभी व्हाट्सऐप. हर जगह उसकी मौजूदगी है. करोड़ों-अरबों लोगों की तरह ही वो भी दिन भर बकर बकर करता रहता है.

ऐसा लगता है जैसे सुनने वाले तो बचे ही नहीं, सब बोलने वाले और इज़हार करने वाले ही इस दुनिया में रह गए हैं. अगर बोलना कला है तो सुनना उससे भी बड़ी कला है पर आज की अगड़म-बगड़म ज़िन्दगी में लोगों को विश्वास ही नहीं होता है कि सुनना भी एक कला है क्योंकि उन्होंने तो सिर्फ बकना ही सीखा है.

इस आसक्ति का शिकार हुए राहुल को यह पता ही नहीं चला कि जो वो सोशल मीडिया और फ़ोन पर तरह तरह के ऐप्स से दुनिया से जुड़ा हुआ है, दरअसल वह इस सिलसिले में खुद से ही कट चुका है. नौकरी करने, घर चलाने और सोशल मीडिया के भ्रमित दिखावे की बराबरी करने के चक्कर में कब वह अन्दर से टूट गया यह उसे एक दिन पता चला जब वह अपने कमरे में अपने लैपटॉप के सामने बैठा था. अचानक उसे अपने भविष्य की चिंता होने लगी कि वो करना क्या चाहता है, कर क्या रहा है और भी न जाने कैसे-कैसे उटपटांग सवाल.

ऐसा पहली बार हुआ था जब वो खुद का विश्लेषण कर रहा था और करते करते बेहद डर गया था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किससे बात करे, क्योंकि यहाँ सुनने वाला तो कोई है ही नहीं, सिर्फ बोलने वाले लोग ही बचे हैं. वह अपने फेसबुक की लिस्ट खंगालता है, ट्विटर पर अनजान दोस्तों के फेहरिस्त जांचता है और फ़ोन पे अनगिनत नंबरों को टटोलता है पर एक ऐसा इंसान नहीं ढूंढ पाता जो सिर्फ और सिर्फ उसे सुने, कुछ कहे नहीं, अपनी सलाह न थोपे. उसका मन उदास हो जाता है और वह सब कुछ बंद करके सोने की नाकाम कोशिश करता है.

ऐसा कई दिन चलता है. कई चीज़ें आप अपने घरवालों से नहीं अपितु अपने दोस्तों के साथ साझा करते हैं पर राहुल तो इस वैकल्पिक जद्दोजहद में एक दोस्त भी न बना पाया था. सब पानी के बुलबुले की तरह इधर उधर उड़ते दिखे और अंततः मानसिक तनाव, नौकरी के दबाव और ज़िन्दगी से बिखराव ने राहुल के दिमाग को चरमरा दिया और उसे उदासी (डिप्रेशन) के गड्ढे में गिरा दिया.

एक हँसता, बोलता, खिलखिलाता नौजवान भरी जवानी में उदासी का शिकार हुआ क्योंकि उसको सलाह देने वाले तो बहुत थे पर सुनने वाला एक भी नहीं.

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अभय मिश्र, दर दर गंगे, समीक्षा, हिन्दी, Dar Dar Gange

दर दर गंगे (किताब समीक्षा)

कई सालों बाद कोई किताब की समीक्षा कर रहा हूँ अपने ब्लॉग पर। पिछली बार तब, जब प्रेमचंद की पहली उपन्यास पढ़ी थी। अगर इतिहास में गोता लगाना चाहें तो यहाँ लगाइए।

आज बात करेंगे दर दर गंगे की। यह किताब मैंने खरीदी नहीं थी पर मुझे भेंट स्वरुप प्राप्त हुई। दरअसल फेसबुक पर गुरुप्रसाद जी ने एक अच्छी सोच के तहत यह प्रस्ताव रखा है कि अगर कोई भी अपनी ओर से किसी किताब की चंद प्रतियां लोगों को भेंट करना चाहे तो ज़रूर करें। इससे लोगों का पठन क्रम भी बंधा रहता है और मेरे जैसे लोग जो नई किताबों की तलाश में रहते हैं, को भी कई विकल्प मिलते हैं। तो इसी सोच के तहत अमित व्रज जी ने भी दर दर गंगे की ३ प्रतियां योग्य लोगों को देने का प्रस्ताव रखा और मैं किताब का नाम पढ़कर ही उत्कंठित हो उठा। जब आजकल गंगा सफाई को ले कर जोरों-शोरों से बातें हो रही हैं तो “दर दर गंगे” जैसे नाम को अपने समक्ष पढ़ना ही मुझे उत्सुक बना गया। मैंने झट अमित व्रज जी के किताब वाली प्रतियोगिता में हिस्सा ले लिया और सयोंगवश जीत भी गया। इसके लिए अमित जी का बहुत आभारी हूँ।

दर दर गंगे को दो लोगों ने मिलकर लिखा है और कई लोगों ने इस किताब को लिखने के लिए शोध किया है। अभय मिश्र और पंकज रामेन्दु इस पुस्तक के लेखक हैं और यह किताब २०१३ में पेंगुइन बुक्स द्वारा प्रकाशित हुई थी।

गंगा की ‘दशा, दुर्दशा और नक्शा‘ को आपके मानसिक पटल और फटी आँखों के सामने यह किताब खोलकर रख देगा। गंगा किनारे बसे कई छोटे-बड़े शहर गाँवों की एक माला को पिरोकर इस किताब को सजाया गया है और बड़ी करीनता से इसकी कहानी बुनी गयी है।

हर हर गंगे का हम मानवों की लघु-सहिष्णुता द्वारा उपहास होते हुए और उसको सामने रखते हुए यह किताब, दर दर गंगे आपको सोचने पर मजबूर करेगी। कभी आप सोचेंगे “लोग ऐसे भी हो सकते हैं?” तो कभी “लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं?” दरसल हम बड़े शहरों में बसे हुए लोगों के साथ यही दिक्कत है कि हम आसमान में रहते हैं और ज़मीन से डरते हैं क्योंकि ज़मीन पर सच आपका बेसब्री से इंतज़ार कर रहा होता है और सच के कड़वे गरल को गटकना हम बड़ी इमारतों के छोटे दिल वालों के लिए कठिन है। दर दर गंगे उसी डर को आपके सामने रखने की एक सफल कोशिश है।

३ साल में अलग अलग खण्डों में किये गए इस गंगा सफ़र और खोज को ३० संभागों में इस किताब में प्रस्तुत किया गया है। उत्तर भारत में बहती माँ के इर्दगिर्द इसके बच्चो-नुमां शहरों और गाँवों को समेटते हुए वहाँ के स्थानीय संस्कृति, विरासत और गंगा से जुड़ी वहां की जिंदगियों को खंगाला गया है।
गंगोत्री, उत्तरकाशी, टिहरी, देवप्रयाग, ऋषिकेश, हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, नरौरा, गंगा नहर, कन्नौज, बिठुर, कानपुर, मनिकपुर, इलाहाबाद, विन्ध्याचल, वाराणसी, गाज़ीपुर, बक्सर, पटना, बख़्तियारपुर, मुंगेर, सुल्तानगंज, भागलपुर, कहलगांव, साहिबगंज, राजमहल, फरक्का, मायापुरी, कोलकाता और गंगासागर नगरों को इस सफ़र का हिस्सा बनाया गया है और हर नगर को गंगाजल में खंगाला गया है।

पढ़ते पढ़ते कभी आप दुखी हो जाएंगे तो कभी हतप्रभ। कभी आपकी आशा बंधेगी तो कभी निराशा। कभी आप सोचने लगेंगे तो कभी विस्मित हो बैठेंगे। यात्राएं रोचक होती हैं और उनका पढ़ना तो वैसे भी रोचक होता है पर जब वो यात्रा आपके इतिहास, संस्कृति और स्वयं से जुड़ी हों तो उस कहानी को आप और लगन से पढ़ते हैं और उसमें खुद को मथते हैं। दर दर गंगे कभी आपको टिहरी बाँध की कहानी से मानव विकास के लिए चुकाया जाने वाला भावों का भुगतान करवाएगा तो कभी ऋषिकेश में पनपते नशेड़ियों और राजनीति से रूबरू मिलवाएगा। कभी आप कन्नौज के खुशबू कारोबार में फैली लोलुपता की गंध को गंगा की नज़रों से देखेंगे तो कभी कानपुर में जुतियों की मार खाते बेबस गंगा के सन्नाटे को सुनेंगे। आखिर कौन सी वो जगह है जहाँ हिन्दू जलाए नहीं गाड़े जाते हैं? आखिर गंगा पर चल रहा करोड़ों का जीवन कैसे खतरे में है? यह सब भी आपकी आँखों के सामने से इसी किताब के जरिये गुज़रेगा। बनारस की गलियों में खोयी गंगा और पटना में विकास की आड़ में छिपी मूक गंगा। भागलपुर में जलजन्तुओं को भी पनाह न दे पाती गंगा और राजमहल में टकराव के बीच बचती गंगा। फरक्का बाँध की बलि चढ़ी गंगा और कोलकाता की जद्दोजहद में बचती गंगा। यह सब आप दर दर गंगे में जान सकेंगे।

वैसे तो पूरे सफ़र में कई उतार चढ़ाव हैं। हर जगह आपको अच्छे और बुरे लोग मिलते जाएंगे पर चूँकि सालों की लोलुपता, स्वार्थ और अनदेखी ने हमसे भी पुरानी इस नदी का जो भेदन किया है, उसे भरना इतना आसान नहीं होगा। हर जगह की अपनी मुश्किलें हैं और कई लोग अपनी अपनी जगहों से इसके लिए लगातार, निश्छल प्रयास भी कर रहे हैं। इनके बारे में भी पढ़कर आपको सुकून मिलेगा और प्रोत्साहन भी। कई परम्पराओं को जानकार आपको आश्चर्य होगा और आपके कौतुहल को और बल मिलेगा। ३ साल के अथक प्रयास से अभय और पंकज ने आपको अपनी माँ को जानने का २२१ पन्नों का तोहफा दिया है। इस तोहफे को ज़रूर अपनाइए और धीरे धीरे अपने ज्ञान, सोच और जीवन को और विस्तृत बनाइये। सच से सामना होना ज़रूरी है क्योंकि अगर आज हमारी आँखें नहीं खुली तो जल्द ही गंगा की आँखों के आगे अँधेरा छा जाएगा। चयन आपका।

जाते जाते बस एक बात और कहना चाहूँगा: गंगा के लिए शायद आप कोई विस्तृत काम न कर सकें पर एक छोटा सा कदम आज ज़रूर लें। प्लास्टिक की थैलियों का कम से कम इस्तेमाल करें। ये भी आधी-तिरछी हों गंगा में ही पहुँचती हैं। बाजार जाएं तो थैला ले कर जाएं। एक छोटा कदम, एक बड़ा बदलाव।

दर दर गंगे खरीदें: फ्लिप्कार्ट, अमेज़न, होमशॉप१८ से।

नोट: जल्दी ही “नीला स्कार्फ”, “मसाला चाय” और “Terms & Conditions Apply” की भी समीक्षा करूँगा। पढ़ते रहिये!

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भारत, युवा, लघु कथा, समाज, India, Young

सस्ती जान

राकेश और मोहित, पक्के दोस्त. स्कूल में ११वीं में एक साथ थे. वैसे तो दोनों मध्यमवर्गीय परिवार से थे पर युवावस्था में आ कर सभी शौकीन हो जाते हैं क्योंकि ये समय ही होता है बेपरवाह उड़ने का.

दोनों को चौपाटी में जा कर खाने का बड़ा शौक था. शहर के एक व्यस्त बाजार में सड़क किनारे खाने का वो आनंद किसे नहीं होगा? पर चूँकि यह जगह उनके घर से दूर था, तो कभी-कभार बस पकड़ के पहुँच जाते था. चंद महीनों पहले मोहित के पापा ने घर के लिए स्कूटी खरीद ली थी और मोहित के लिए ‘लर्नर्स लाइसेंस’ भी बनवा दिया था. गाहे-बगाहे दोनों इसी स्कूटी पर मस्ती मारने निकल पड़ते पर घर से यह सख्त हिदायत थी कि दोनों को हेलमेट पहनना पड़ेगा. शहर में भी यही नियम था.

घर से निकलते वक़्त तो दोनों हेलमेट पहने हुए निकलते पर अगले ही नुक्कड़ पर पीछे बैठा यात्री अपना हेलमेट अपने हाथों में टांग लेता. फिर तो बस उन चौराहों पर जहाँ पुलिस खड़ी होती, वहीँ पर हेलमेट सिर पर सजता था नहीं तो हाथ पर. कई महीनों तक ऐसा चलता रहा और अब तो यह आदत सी बन चुकी थी. वैसे भी हिंदुस्तान में जान जाने से ज़्यादा चालान कटने का डर लगता है.

बस काल को इसी एक दिन का इंतज़ार था. दोनों चौपाटी की ओर बढ़ चले थे और पुलिस चौराहा पार करते ही पीछे बैठे राकेश ने अपना हेलमेट सिर से उतारकर हाथों में टिका लिया था. सड़क के अगले कोने पर ही एक बदहवास कुत्ता न जाने कहाँ से उनके सामने आ गया और तीव्र गति में चल रही स्कूटी को मोहित संभाल न सका और कुत्ते से बचने के चक्कर में पास ही में चल रहे डिवाइडर पर स्कूटी दे मारी.

इसके बाद दोनों हवा में उछल के सड़क के उस पार और फिर मोहित को कुछ याद नहीं. शायद कई दिन बीत गए थे और आज जा कर अस्पताल में उसकी आँखें खुली. कमरे में इस वक़्त कोई नहीं था. बस एक अखबार पड़ा था जिसमें एक फोटो थी एक नौजवान की. वह गिरा पड़ा था सड़क पर और उसके हाथों में एक हेलमेट अटका हुआ था. उसके सिर से खून का तालाब सड़क पर बन चुका था. नीचे लिखा था:

“जान सिर में होती है, हाथों में नहीं” -ट्रैफिक पुलिस

साभार: गूगल

 

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भारत, मेरी सोच, समाज

आँखों देखी (फिल्म)

ऐसा कब होता है जब आप एक भ्रामक अवस्था में धकेले जाते हों और वहीँ पर रह जाना चाहते हो? मेरे साथ तो ये तब होता है जब मैं वो फिल्में देखता हूँ जो असलियत को आपके चेहरे पर दे मारती है। ऐसी फिल्में जो सिर्फ परदे पर एक बनावट है पर हज़ारों जिंदगियों की सच्चाई। ऐसी फिल्में जिसे इस सच्चाई का डर नहीं कि वो पैसा कमाएगी कि नहीं पर उसे इस बात का गर्व है कि वो लोगों को धरातल पर रखेगी।

वैसी ही एक कला-फिल्म, “आँखों देखी” अभी देखी। ऐसा महसूस हो रहा था मानो कि मैं फिल्म के किरदारों का हिस्सा बन चुका हूँ। डेढ़ घंटे के लिए मेरी सच्चाई उस फिल्म की कहानी थी, उस फिल्म के लोग। ऐसी फिल्में देख कर मन रोमांचित हो उठता है और दिल चाहता है कि वह कहानी चलती रहे, निरंतर, अबाध, एकटक!

साभार: विकिपीडिया

मैं इस फिल्म की समीक्षा नहीं कर रहा हूँ, मैं तो सिर्फ यही समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि भौतिकवादी बाज़ार में सच को दिखाने वाले लोग भले ही कम हों पर जब भी वो सच आता है तो दिल को सुकूं सा मिलता है कि कला अभी भी सर्वोपरि है, उसे रुपयों में नहीं खरीदा जा सकता, वो बिकाऊ नहीं है। उन बनावटी फिल्मों से मन और भी उचट जाता है जब एक कला-केन्द्रित फिल्म मेरे आँखों के सामने से गुज़रती है।

पर एक सिद्धांत यह भी है कि मनुष्य का मन इतना भीरु और डरपोक है कि वो सच्चाई का सामना करने से डरता है और यही एक कारण है कि जब उसे फिल्मों के माध्यम से मिथ्या परोसा जाता है तो वह बड़ी रूचि से उसे चबाता है। ये फिल्में मिठाई की तरह है जिसे खाने पर एक सामान्य मनुष्य को लगता है कि बस इसका स्वाद सदा-सदा के लिए उसके जीभ पर बना रहे, पर ऐसा हो नहीं पाता। कला-केन्द्रित फिल्में करेले की तरह होती है क्योंकि वो हमें सच से सामना करवाती हैं और सच हमेशा कड़वा होता है। ऐसी फिल्मों में ना ही एक अजेय नायक होता है और ना ही सिर्फ प्रेम पाने को आतुर एक नायिका। मुझ जैसे, आप जैसे, किसी सामान्य इंसान को उठा लीजिये, इन फिल्मों के किरदार हमारी जिंदगियों से मिलते-जुलते से ही होते हैं। हम जिस ज़िन्दगी को जी रहे हैं ये कला केन्द्रित फिल्में उसी ज़िन्दगी की निरंतरता है और इसलिए यह करेला हमें उतना कड़वा नहीं लगता। वहीँ पर जो मिथक है, जो असत्य है, जो केवल हमारे मन का भ्रम है, ऐसी फिल्में हमें हमारी स्वाभाविक जिंदगियों से निकालकर एक कल्पित स्तर पर ला कर फेंक देती है जिससे वापस सच्चाई की धरा पर गिरना बेहद दर्द देने वाला होता है।

२ तरह के लोग होते हैं।
एक जो इस कल्पित दुनिया का हिस्सा बनकर जीना चाहता है। वह इस बात से घबराता है कि उसके सामने सत्य आ कर न खड़ा हो जाए। उसका सच दरअसल इस दुनिया के द्वारा परोसा हुआ झूठ है। उसे ज़्यादातर ऐसी ही फिल्में पसंद आएंगी जो उसके झूठ को और विस्तृत करेंगे, जो उसे उस झूठ में ही बांधे रखेंगी, जो उसे सत्य का सामना करने से बचाएंगी।

वहीँ दूसरी ओर ऐसे लोग होते हैं जो नित्य यह खोजते रहते हैं कि आखिर सत्य क्या है। उन्हें इन मिथक चलचित्रों से घनिष्ठ द्वेष रहता है। वो अपनी ज़िन्दगी में, अपने आसपास घट रही घटनाओं से, लोगों से, चलचित्रों से, किसी भी चीज़ में केवल सत्य को खोजने की कोशिश करते हैं और ऐसे ही लोगों के लिए “आँखों देखी”, “शिप ऑफ़ थिसियस” जैसी कला-केन्द्रित फिल्में बनाई जाती हैं। पहली श्रेणी के लोग ना ही ये फिल्में देख सकते हैं और ना ही इन्हें समझ सकते हैं।

वैसे भी भारत इतना बड़ा देश है और यहाँ के लोगों की मांगें इतनी विस्तृत हैं कि यहाँ सब चलता है। निरर्थक बातें वायरस की तरह फ़ैल जाती हैं और अर्थपूर्ण बातों को गला कोख में ही घुट जाता है। और चूँकि भारत की आबादी इतनी ज्यादा है, इसलिए यहाँ पर हर तरह की फिल्में भी चल जाती हैं।

खैर यह तो आप ही निश्चित करेंगे की आपके जीवन का सत्य क्या है। क्या आपका सत्य दुनिया द्वारा परोसा गया झूठ है या फिर आप अपने सत्य का निर्माण खुद, अपने दम पर करना चाहते हैं। फिल्में तो एक जरिया है ज़िन्दगी को अपने दृष्टिकोण से देखने का और मेरा कोण आपके कोण से अलग ही होगा क्योंकि आपकी “आँखों देखी” और मेरी “आँखों देखी” में बहुत फर्क हो सकता है 🙂

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