भारत, मेरी सोच, व्यंग, समाज, India, Light Comedy

बुरा तो मानो… होली है!

आजकल लोग बुरा नहीं मान रहे, क्या बात हो गयी है ऐसे? अभी कुछ दिन पहले तक तो लोग सुई गिरने पर भी हल्ला बोल मचा देते थे। अभी कल ही एक दोस्त मिला कई अरसे बाद। मैंने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई कि अब शादी हो गई है तो मिलता नहीं है, जोरू का गुलाम हो गया है, बीवी आते ही दोस्त बेकार हो गए? मुझे लगा कि वो अब आहत हो, तब आहत हो, पर मुए ने सिर तक न हिलाया, मुस्कुराता रहा। मुझे लगा था कि अब बोलेगा, या भड़केगा या बचाव करेगा पर नहीं, जनाब ने मुझे चारों खाने चित कर दिया था। मैं मायूस हो गया और उसके बजाय खुद ही आहत हो लिया। फिर मुझे लगा शायद शादी की डसन ने बेचारे को ज़्यादा उत्तेजित होने की कला से विरक्त कर दिया है तो मैं अपने रास्ते हो लिया।

आजकल फैशन में बुरा मान जाना बहुत चल रहा है इसलिए अगर कोई ऐसा नहीं मानता तो उसके खिलाफ तो मैं खुद ही बुरा मान जाता हूँ कि उसने बुरा क्यों नहीं माना? भई, समाज भी कुछ होता है! हमें बचपन से संस्कार मिला है कि समाज के साथ चलो, उसके जैसा करो, तब समाज आगे बढ़ेगा और तुम भी समाज की नज़रों में हवाओं पर उड़ोगे। बस इसलिए जो समाज में फैले फैशन के खिलाफ जाता है तो हम आहत हो जाते हैं। मैं तो कहता हूँ कि बच्चा परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो तो उसके शिक्षकों से ले कर, माँ-बाप, रिश्तेदार इत्यादियों को भी तुरंत आहत हो लेना चाहिए। इससे समाज का संतुलन बना रहेगा। नहीं तो क्या है कि बच्चा भी घबरा जाएगा कि लोग बुरा क्यों नहीं मान रहे हैं। हमें उस बच्चे की मानसिक हालत की हवा नहीं निकालनी है तो बुरा तो मानना ही होगा। आखिर अनुत्तीर्ण होना तो घोर अपराध है जिससे उसका जीवन व्यर्थ हो सकता है और समाज बर्बाद।

सुबह-शाम, दोपहर-रात, घर-ऑफिस, बस-ट्रेन, मालिक-नौकर, आदमी-जानवर, इत्यादि सभी मौकों और परिस्थितियों को हम आहतों के अनुकूल बना रहे हैं जो कि एक प्रशंसनीय कदम है। एक दोस्तनी को २ दिन तक मेसेज का जवाब नहीं दिया तो तीसरे दिन बुरा लगने का मेसेज आ गया और लिखा था कि वो २ दिन तक कुढ़ती रही थी और वो मुझसे बहुत आहत है क्योंकि मैंने उसके “कैसे हो?” का जवाब नहीं दिया था। मैंने उसे जवाब में लिखा, “मुझे तो तुम्हारा मेसेज ही नहीं मिला और तुम यूँ ही आहत हो ली? फ़ोकट में आहत हो कर कैसा लग रहा है? वैसे भी आजकल चलन में है। 😀” उसका जवाब तो अभी तक नहीं आया है। शायद कुछ दिन और कुढ़ेगी। कुढने दीजिये, अच्छा है समाज के लिए। इसी सिलसिले में ४-५ और लोगों को आहत करेगी और ये कड़ी को बढ़ाने में मदद करेगी।

और ये देखिये, बुरा मानने वाला तो सबसे बड़ा त्यौहार भी आ रहा है। मैं तो कह रहा हूँ कि होली की टैगलाइन को बदल कर “बुरा तो मानो होली है!” कर देना चाहिए क्योंकि बुरा मानने वालों की जमात अभी बहुमत में है। इससे सुनहरा मौका नहीं मिलेगा इस आहती सोच को बढ़ाने में। मार्केटिंग के ज़माने में टाइमिंग भी आखिर कोई चीज़ होती है। होली के दिन अगर कोई घर पर आ कर बाहर निकलने को कहे तो साफ़ कह दें कि इस बार वो होली नहीं खेलेंगे क्योंकि वो सरकार से आहत हैं कि उसने अपने वायदे पूरे नहीं किये या फिर कह दें कि इंद्र देव ने बिन मौसम “बरसो रे मेघा” कर दिया इसलिए वो नाक-भौं सिकोड़े बैठे हैं या फिर कह दें कि ओबामा ने भारत के खिलाफ जो बयान दिया है वो उनके गले नहीं उतरी है इसलिए इस साल वो अपने गले से भांग भी नहीं उतरने देंगे। कहने का मतलब है कि टुच्ची से टुच्ची बात के लिए भी अब हमको बुरा मान लेने की आदत डालनी पड़ेगी।

कोई कुछ ट्वीटता है तो ५० लोग हंगामा कर बैठते हैं, उन ५० लोगों के खिलाफ फिर १०० लोग हल्ला बोल देते हैं और फिर उन १०० के खिलाफ… आप समझ रहे हैं ना? बस यही जो कड़ी-दर-कड़ी, ट्वीट-दर-ट्वीट, पोस्ट-दर-पोस्ट, बयान-दर-बयान बुरा मानने का सिलसिला चल रहा है इसे हमें तब तक ख़त्म नहीं होने देना है जब तक हम ना ख़त्म हो लें। वैसे भी आजकल दिन भर का रोना हो गया है कि ज़िन्दगी बेकार हो गई है, नौकरी बेजान सी है, कोई आपको प्यार नहीं करता, आप ४ घंटे ट्रैफिक में बिताते हैं और भी न जाने क्या क्या। इसलिए इसका सबसे बढ़िया उपाय इन सबसे ऊपर उठने की बजाय आहत हो हो कर मर जाना अच्छा है। नहीं? अरे, अरे, आप तो बुरा मान गए। खैर मंशा तो मेरी यही ही थी।

देखिये अब मैं तो कहता हूँ कि आप ये पोस्ट पढ़ कर जबरदस्त ढंग से बुरा मान जाएँ कि इस पोस्ट से तो समाज में नकारात्मकता फैल रही है और इस पोस्ट को पढ़ कर कितनों की ज़िन्दगी तबाह हो जाएगी। और हाँ इस बुरा मानने के सिलसिले में ब्लॉग का लिंक भी फैला दीजियेगा। क्या है ना कि मार्केटिंग का ज़माना है और हमें फ़ोकट की मार्केटिंग बहुत पसंद है ठीक उन्हीं की तरह जो बे सिर-पैर की बयानबाजी से आपको आहत किये जा रहे हैं और आप उनकी फ्री फ़ोकट मार्केटिंग। अरे रे ये तो राज़ की बात खुल गई। वैसे कोई बात नहीं, आप तो हमारे मित्र हैं। मैं बुरा नहीं मानूँगा।

नोट: अभी अभी हमारी दोस्तनी का जवाब आ गया है। कह रही है कि उसने मुझे सोशल मीडिया पे हर जगह ब्लॉक कर दिया है। मुझे तो वैसे भी धेला फर्क नहीं पड़ रहा था। चलिए मगझमारी कम हुई एक 🙂
आपको होली की शुभकामनाएँ। खूब होली खेलिए-खिलाइए और लोगों को बुरा मनवाइये और ज़ोर से बोलिए, “बुरा तो मानो…”

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कुत्ता गोष्ठी

कुत्तों की गोष्ठी हो रही थी और आस पास वाले मोहल्लों से भी सहभागी इस गोष्ठी में शामिल हुए थे। गोष्ठी का कोई खास उद्देश्य तो नहीं था। बस अपनी-उसकी सफलताओं का अंधबखान, तालियाँ, भौंकालिया इत्यादी। गोष्ठी एक छप्पर के नीचे जमी हुई है जो कुछ साल पहले किसी भिखारी की हुआ करती थी। इसमें बस एक छप्पर है और कुछ नहीं। थोड़ी बहुत रौशनी सड़क पे लगे लैम्प से आती है और वो तब जब उसमें खुद विद्युत घुसे।
street dogs

अब चूँकि ये गली के कुत्ते हैं तो इनके कारनामे भी वही छोटे-मोटे नेताओं जैसे। जैसे लोकल नेता अपने चार-पांच चमचों को ले कर गुंडागर्दी करके अपने आपको तीसमारखां समझते हैं, ठीक वैसे ही ये गली के कुत्ते भौंकाली झाड़ रहे हैं।
एक कहता है, “कुत्ते भाईयों, अभी ४ दिन पहले की ही बात है, एक मरियल मोबाइल पर खिसियाता हुआ जा रहा था। इधर मैंने बंटी और चंटी को इशारा किया तो दोनों भी सतर्क हो कर इसके पीछे हो लिए। आगे वाले कचरा डब्बे के बाजू में जो नाला है ना, ठीक उसी के पास पहुँचते ही हमने यात्री को भौंका कर चौंका दिया। बेचारे का मोबाइल छपाक से नाले में। बाऊहाहाहा, हम कुत्तों की तो घिग्घी बंध गयी। बिन मोबाइल के बकरे की हालत देखने की थी।
इतने में चौथा कुत्ता भौंकलाया और बोला, “वाह कुत्ते भाई, उसके बाद की कहानी भी तो बताओ। जो उसने तीन पत्थर उठा कर तुम तीनों पर बरसाए थे तो कैसे मिमियाते हुए भागे थे उलटे चारों पैर? कम्मकल तुम्हारे कारण मुझे भी वहाँ से कटना पड़ा था। अच्छा भला मैं बासी ब्रेड-मक्खन खा रहा था। वो करमजली मेमसाहब ने ऊपर से फेंका था। मैंने देखा, बिल्ली ले गयी ब्रेड मेरे निकलते ही”
पहला कुत्ता थोड़ा हड़बड़ाता हुआ बोला, “अब यार थोड़ा रिक्स तो उठाना पड़ता है ना। कभी-कभी कुछ तूफानी करते हैं और उसमें भी तुमको नुक्स दिख रहा है। हः!”

इतने में दूसरे मोहल्ले से आये २-३ कुत्ते अपनी कथा बघारने लगे। बोले “अमा तुम तो बस नालों में ही ऐश करो। हम ३ ने तो कल एक ऑटो वाले को जो दौड़ाया है, बेचारा ऑटो को ट्रक की तरह उड़ा ले गया। वो तो हमने अगले कट पर उसको छोड़ दिया। कुत्ता-बॉर्डर आ गया था ना, नहीं तो उसके ऑटो को पलटा कर ही छोड़ते। अरे हमने इतने साइकिल, ऑटो, अल्टो, नैनो, बाईक्स को पछाड़ा है कि तुम्हारी बिसात ही क्या। तुम कुत्ते गन्दी नाली के टुच्चे आदमी….”
‘आदमी’ बोलना था कि दोनों गुटों में घमासान छिड़ गया। कुत्ता वार हो गया और पूरा मोहल्ला हिल गया। तभी एक दरबान ये लंबा डंडा ले कर आया तो दोनों ओर के कुत्ते पिलपिलाते हुए भगे और अपने-अपने बिलों में घुस गए।

कुछ दिनों बाद एक और कुत्ता गोष्ठी हुई पर इस बार रईस इलाके के कुत्तों की। वहाँ की तो शान भी देखते बनती थी। चारों ओर हड्डियां अलग-अलग आकारों में सजी हुई, इलाके के सामुदायिक केन्द्र की मखमली घास पर हलकी-हलकी रौशनी आते हुए, कुत्ते विदेशी मार्का वाले पट्टे पहने हुए, कुछ तो ऊनी मफलर ओढ़े हुए, लगता था मानों रईसों की ही कोई मीटिंग हो। कोई ज़्यादा भौंकना-गुर्राना नहीं, तहजीबों की महफ़िल थी।
इसको कुत्तों की किटी पार्टी कह सकते हैं। ये भी हफ्ते में एक बार मिलते हैं। अपनी रईसी दिखाते हैं और अपनी-अपनी महंगी कारों में बैठ कर चले जाते हैं।
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एक जनाब-ए-कुत्ते ने फरमाया, “हे गाईज़, आप लोग को पता है कल मैंने कौन सी गाड़ी को खदेड़ा?” सब भौंकचक्के से उसको देखते हैं और वो अपनी भारी गुर्राहट में कहता है “मर्सिडीज़ बेंज” और सबकी आवाज़ स्तब्धता के कारण ‘कुकुरी गुर्राहट’ से ‘मानवी आह’ में बदल जाती। उस कुत्ते के लिए सबके मन में एक इज्ज़त पैदा हो जाती है।
पर तभी दूसरे कोने में खड़े कुत्ते ने अपना जबड़ा खोला और भौंका, “इसमें क्या शाही बात है? मैंने तो कल ही एक लैम्बौरग के आगे वाले पहिये पर अपनी छपाक छाप छोड़ी” अब सारी आह मुड़कर इस नये महाशय पर आ टिकती है।
इसी तरह ये कुकुरी-किट्टी बड़े ही अदब और शालीनता से चलती रहती है। यहाँ पर बातें केवल गद्देदार गिद्दों की, आरामदायक गाड़ियों की, ममतामयी मालकिनों की और लज़्ज़तदार खाने की होती है।
सब एक से बढ़कर एक रईसकुत्जादे हैं और इनकी दुनिया हमारे गली के बाहर नाले किनारे कचरों में धंसे कुत्तों से बिलकुल भिन्न है। इन्हें उस दुनिया के बारे में कोई अंदाज़ा नहीं है और ना ही उन्हें इनकी दुनिया के बारे में। कुत्तों की जिन्दगी में अभी टीवी और फेसबुक जो नहीं आया है..

जाते जाते मेरी आवाज़ में एक गीत भी सुनते जाइए: कौन मेरा (स्पेशल २६)

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कैसे कैसे गीत (भ्रष्ट गीत)

गीत तो हम सब गाते हैं। कुछ स्नानागार में, कुछ सभागार में, कुछ कारागार में, कुछ आगार (बस डिपो) में और भी न जाने कहाँ-कहाँ। गाना सबको आता है, यह तो कुदरती है। पर जनाब किसी को बोलिए कि दो पंक्ति सुना दे और वो नये नवेले दुल्हे की तरह शरमा जाता है (दूल्हा इसलिए बोला है क्योंकि आजकल लैंगिकवादी का इलज़ाम CBI की क्लीन चिट्स की तरह लोगों को बांटा जा रहा है)। पर कुछ लोग तो ऐसे ढीठ हैं कि सार्वजनिक जगहों पर भी गला फाड़ देते हैं। दरअसल कानों में टुनटुना ठूसने के बाद किसी बात का ध्यान नहीं रहता। दिल्ली मेट्रो में तो ऐसे लोग भरसक प्राप्त होते हैं। “कृपया मेट्रो में संगीत ना बजाएं और सहयात्रियों को परेशान ना करें” घोषणा होने के बावजूद लोग टुनटुने से उद्घोषक को ठेंगा दिखा देते हैं और अपनी आवाज़ से सहयात्रियों को। पूरे सफर में किरकिरी तो तब होती है जब जनाब/जनाबिन के टुनटुने से महावाहियात, महाबेसुरा, महाबेसिरपैरा गाना लीक हो रहा होता है। उससे बचने का एक ही उपाय है कि आप भी एक टुनटुना ठूस लें। जैसे लोहा, लोहे को काटता है वैसे ही टुनटुना, टुनटुने को!
खैर हम बात कर रहे थे गीत गाने की।
कुछ तो बचपन से देवदास बनने का बोझ उठा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि वो दारु की बोतल लिए चुन्नी और चंद्रमुखी के साथ यात्रा पर निकलते हैं पर उनके गीत बड़े ही निराशाजनक और अपच पैदा करने वाले होते हैं। वो दिनभर ऐसे ही गीत सुनते हैं और सामूहिक संचार माध्यम (सोशल मीडिया) से लोगों को भी प्रताड़ित करते हैं। कभी-कभार ऐसे गीत सुन लो तो दुःख हल्का होता है पर हर रोज ऐसे गीत? देवदास ही बचाए!
दूसरी ओर कुछ महानुभाव(विन) ऐसे होते हैं जो केवल ढिनचैक गाने सुनते हैं। जहाँ जाएँगे, घोर मस्ती गीत शुरू कर देते हैंदेखने में आया है कि ये यो योके फैन क्लब पेज भी चलाते हैं। इनको शब्द या अर्थ से कोई लेना देना नहीं होता। पर ये आपको किसी टिप्पणी पर लैंगिकवादी बताने में पीछे नहीं रहेंगे। तो सावधान रहें। इनके साथ नाचिये और अपनी राह तकिये।
तीसरी श्रोता श्रेणी उन लोगों की है जो केवल गहन अर्थ वाले गाने ही सुनते हैं। ये प्रवाचक होते हैं और यो योके ‘अ-फैन’ क्लब पेज चलाते हैं। अगर गीतकार ने लिखा होता है कि “आसमान नीला है” तो ये इस पंक्ति की गहरी खुदाई करते हैं, फ़िर उसमें कूद पड़ते हैं और आसमान फाड़कर सोना निकालकर पेश होते हैं। ऐसे लोग साहित्य के अच्छे अध्यापक बनते हैं और बच्चों की कमर तोड़ते हैं।
चौथा श्रेणी है नेताओं का। ये केवल एक ही तरह के गीत सुनते और गाते हैं। “भ्रष्ट गीत”! ऊपर मौजूद सभी तरह के श्रोताओं को ये सालों से अकेले ही धोते आते रहे हैं। यही इनका राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत है। ये स्नानागार, सभागार, कारागार, इत्यादि, लगभग हर जगह भ्रष्ट गीत ही गाते हैं।हमारे ख़ुफ़िया पेटी वादक ने इनके एक भ्रष्ट गीत को खोद निकाला है और आपके समक्ष पेश कर रहा है। आप भी सुनिए और बताइए कब बंद होंगे ऐसे भ्रष्ट गीत?

इसी गीत का एक वीडियो भी मैंने तैयार लिया है. देखिये और मस्त हो जाइए!


वैसे
कैसा भी गीत हो, अगर कर्णप्रिय है तो सब ठीक है। सबकी अपनी-अपनी पसंद है। कोई ग़मगीन, कोई मस्तीलीन, तो कोई अर्थलीन है। जो जैसा है वैसा रहे। हम-आप बस मस्ती करते रहें सबके साथ।

पर हाँ, ये भ्रष्टलीन श्रोताओं की आवाज़ अब बंद करनी होगी। नया साल आ रहा है। तो झाड़ू लगाइए, पोंछा लगाइए, वैक्यूम क्लीनर इस्तेमाल करिये, पर सफाई पूरी हो अबकी। 
नये साल की शुभकामनाओं के साथ राम-राम, आदाब, सायोनारा, जय भारत!

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थूकन कला

थूकना”, यह एक ऐसा शब्द है, एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे हर भारतीय बहुत ही परिचित और बहुत ही अनजान है। परिचित इसलिए क्योंकि वो इस क्रिया को दिन में कई बार करता है और अनजान क्योंकि वह यह प्रक्रिया अनायास ही करता रहता है। जिस कुशलता से हम सांस लेते हैं, उसी दक्षता से हम थूकते भी हैं। यह तो हम भारतीयों की कला ही मानिए कि ऐसे कार्य को भी बेझिझक कर जाते हैं और उससे भी ज्यादा अचंभित करने वाली बात यह है कि जो दर्शक-दीर्घा वाले लोग हैं, उन्हें भी इस बात का ज्ञान नहीं होता कि सामने वाला आदमी यह कर गया। हम इस थूकन प्रक्रिया के इतने आदि हो चुके हैं कि अब यह हमारी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा बन चुका है।

बचपन से ही हम अपने आस पास लोगों को यह अनोखी कला के धनी बने पाते हैं। कोई दीवार पे थूक रहा है, कोई सड़क के किनारे, कोई सड़क के बीच तो कोई चलती बस में से राहगीर पर। 

चित्र: गूगल बाबा की देन है
जनाब भारत में तो ऐसे कई गली कूचे हैं कि अगर कोई इंसान किसी अनजान गली से गुजार रहा है तो उसके ऊपर टपाक से “गीली तीर” लगती है और इससे पहले कि वो समझ सके कि यह किस घर से आया, वो उन तंग गलियों की चहचाहट और घरों की बनावट से ही डर के तेज़ी से निकल जाता है। पर वहाँ के रहने वाले बाशिंदों को यह कला की पूरी पहचान है और वो बड़ी चतुराई से इन तीरों से बच निकलते हैं, हर बार!

तो हम बचपन से ही इस कला को आम मानते हैं और कई बार तो दोस्तों के बीच यह शर्त और लग जाती है कि कौन कितनी दूर थूक सकता है। और जब हम ज्यादा दूर नहीं पहुँच पाते हैं तो निराश हो जाते हैं कि यह अद्भुत कला हम न सीख पाए। पर अगर बड़े हो कर विदेशों में यह कला प्रदर्शन करते हैं तो जुर्माना देते हुए पाए जाते हैं (और सोचते हैं कि यहाँ तो इस कला की कोई कद्र ही नहीं!)

मेरा तो यह मानना है कि थूकन कला की प्रतियोगिताएं आयोजित होनी चाहिए क्योंकि हमारे देश में एक से एक धुरंधर इस कला में महारत हासिल कर के बैठे हैं। अपने दूकान के गल्ले पर बैठे-बैठे यों थूकते हैं कि सीधा दूसरी तरफ बह रहे नाले में छपाक! राह चलते लोग हैरत और इज्ज़त से सलाम ठोक कर जाते हैं। जनाब, अगर इस कला को भुनाना है तो इसकी प्रतियोगिताएँ स्कूल, कॉलेज, जिला, शहर, राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक करवाए जाएँ और फ़िर अन्तराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग करने के लिए पाकिस्तान, बंगलादेश, इत्यादि जैसे देश तो हैं ही जहाँ यह कला लोग इसी देश से सीख कर गए हैं। मैं तो कहता हूँ कि धीरे-धीरे सही मार्केटिंग द्वारा इसको और देशों में फैलाया जाये और फ़िर देखिये भारत का बोल बाला। अकेले इस खेल में ही इतने पदक जीत जाएँगे कि चीनी और अमरीकी दाँतों तले थूक निगल लेंगे!


ज्यादा दूर तक थूकना”, “थूक कर निशाना लगाना”, “
सीमित समय में सबसे ज्यादा और सबसे दूर थूक पाना” जैसे विविधता के साथ इसकी शुरुआत की जा सकती है। बाकी तो आजकल सब मार्केटिंग का खेल है। सही से किया जाये तो कचरा भी सोने के भाव बिक ही रहा है।

मेरे खयाल में थूकना भारतीयों के जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है तभी तो इतने मुहावरे भी थूकने पर भारत में बहुत प्रचिलित हुए हैं जैसे:

1.) थूक कर चाटना (कितने ही भारतीय नेता इस मुहावरे को चरितार्थ करते हैं। पहले अपने बेहूदे बयान थूकते हैं और फ़िर बड़ी बेशर्मी और सफाई से चाट भी जाते हैं)

2.) मुँह पर थूकना (अब इस श्रेणी में तो हर रोज कई लोग आते हैं। बेईज्ज़ती करने में तो कईयों को इतना मज़ा आता है कि फ़िर वो यही कहते पाए जाते हैं किफलां के मुँह पर थूक आया”, “फलां के मुँह पर ऐसा थूका कि रोने लगा”, इत्यादि। और फ़िर कई लोग तो ऐसे हैं जो इस मुहावरे को कुछ ज्यादा ही गंभीरमान लेते हैं और वाकई में थूक आते हैं किसी के मुँह पर!)

3.) थू-थू होना (यह श्रेणी भी कई नेताओं के लिए बहुत सटीक बैठती है। जहाँ जाते हैं, थू थू करवा आते हैं। और आजकल तो सोशल मीडिया पर भी यह करना बहुत आसान हो गया है। एक बयान दो और हज़ारों की थू-थू मुफ्त पाओ!)

ऐसे ही और कई मुहावरे हैं जिनका विश्लेषण हम भारतीयों पर सौ दम फिट बैठता है।

और फ़िर जहाँ लोग गुटखा तम्बाकू में लिप्त हैं वहाँ थूकना न हो तो कहाँ हो? थूक थूक कर रंगीन दीवार बनाने की कला तो कोई हमसे ही सीखे। और यह तो खासकरसरकारी दफ्तरों की सीढ़ियों में बेहद आसानी से पाए जाने वाली कलाकृतियों मेंसे है।

चित्र: गूगल बाबा की देन है

और आजकल जिस तरह के “मॉडर्न आर्ट्स” चल/बिक रहे हैं, अगर कुछ थुक्कड़ को एक चार्ट पर थूक कर अपनी कला उजागर करने को कहा जाए तो करोड़ों में वो पेंटिंग “मॉडर्न आर्ट्” के नाम पर विदेशों में बिकेगी। मैं तो कहता हूँ कि कई निठल्ले रातों-रात अमीर हो जाएँगे और देश का नाम रौशन करेंगे!

अंत में तो यही कहना चाहूँगा कि भगवान का दिया इस देश में सब कुछ है। बस ज़रूरत है एक पारखी की, उसको पहचानने की। फ़िर देखिये कि यह “थूकन कला” भारत को कहाँ का कहाँ ले जाती है!

इसी आशा के साथ कि अब हम सब मिलकर इस “वाट एन आईडिया सर जी!” पर चिंतन और कार्य शुरू करेंगे, तब तक “ताकते रहिये, रुकते रहिये, थूकते रहिये, चूकते रहिये और जो ना चुके, तो लुकते रहिये!”

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"भाग डी.के.बोस" का सरल हिन्दी अनुवाद

यह लेख मैंने काफी पहले लिखा था पर पोस्ट नहीं किया था ।
पहले ही बता दूं कि गीत की गहराई को समझते हुए इसके विश्लेषण को आराम से पढ़ें ।
पोस्ट की लम्बाई पर मत जाओ, अपना समय लगाओ 🙂

Daddy मुझसे बोला, तू गलती है मेरी
तुझपे जिंदगानी guilty है मेरी
साबुन की शक़ल में, बेटा तू तो निकला केवल झाग
झाग झाग
भाग-भाग डी.के.बोस…

डी.के.बोस, हिन्दी फिल्म इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाने वाला और गाया जाने वाला गीत है..
गायक ने बेहतरीन तरीके से अपने मन की और भारत के करोड़ों नौजवानों के मन की भड़ास को बेहद ख़ूबसूरती से प्रस्तुत किया है जिसका सेंसर बोर्ड भी लोहा मान चुकी है..
इस गीत से साफ़ पता चलता है कि गायक को डी.के.बोस, डी.के.बोस बार-बार बोलने की बिमारी है और इस बिमारी के कारण उन्हें यहाँ वहां भागते रहना पड़ता है…

पंक्तियों की शुरुआत में गायक अपने पूजनीय पिताश्री का सम्मान करते हुए, अपने और अपने पिताश्री के बीच हुए सौहार्द भरे वार्तालाप को बयां कर रहा है…
उसके पिता, उसे बिलकुल पाजी मानते हैं और कहते हैं कि जिंदगी में उन्होंने दो गलती की है.. १) शादी करके और २) उसे पैदा कर के..
शादी करके गलती करने वाली बात को गायक ने बेहतरीन तरीके से शब्दों के बीच छुपाया है और उसे कोई विरले ही समझ और रसास्वादन कर सकते हैं.. अर्थात उसके रस को पहचान सकते हैं..
तत्पश्चात, पिताश्री, जिसे गायक डैडी कहकर संबोधित कर रहा है (जिससे उसके उच्च कुल में पैदा होना का प्रमाण मिलता है), उसकी उपमा रोजमर्रा में आने वाली चीज़ों से कर रहे हैं..
वो कहते हैं कि तू उसी लोकल साबुन की तरह है जो सस्ता होता है और देश में बढ़ रही महंगाई के कारण खरीदना पड़ रहा है और उसके इस्तेमाल के बाद उनके मन में ग्लानि हो रही है क्योंकि इस लोकल साबुन से केवल झाग ही निकलता है पर शरीर के गन्दगी को साफ़ करने में यह असक्षम है… ठीक उसी तरह जिस तरह उनका पाजी बेटा कोई भी काम करने में असक्षम है…
इसके बाद डैडी उसे भागने को कहते हैं और उन्होंने अपने बेटे का उपयुक्त नाम “डी.के.बोस” रख कर अपना काम आसान कर दिया है क्योंकि जब वो इसका बार-बार जाप करते हैं तो जो वो असल में कहना चाहते हैं, वो बाहर आ जाता है… पर चूँकि भारतीय संस्कृति में अपशब्दों का अपने बच्चों के सामने प्रयोग करने का कोई प्रयोजन नहीं है, इसलिए ऐसे नामों के सहारे, आने वाली पीढ़ी के बाप शिक्षा ले सकते हैं और अपने दिल की भड़ास बेहद ही शातिरी से, छुपाते हुए भी निकाल सकते हैं..

ओ by God लग गयी, क्या से क्या हुआ
देखा तो कटोरा, झाँका तो कुआं
पिद्दी जैसा चूहा, दुम पकड़ा तो निकला काला नाग
भाग-भाग डी.के.बोस…

उपर्युक्त पंक्तियों में गायक अपने भगवान को याद कर रहा है और इससे समझा जा सकता है कि वह धार्मिक प्रवृत्ति वाला इंसान है और फिलहाल दुःख में है.. क्योंकि हम केवल दुःख में ही ऊपर वाले का आह्वान करते हैं..
गायक को समझ नहीं आ रहा है कि उसके साथ ये कैसे हो रहा है? ठीक उसी तरह जिस तरह दिग्विजय सिंह को पता नहीं चलता कि वो जो बोल रहे हैं वो क्यों, कैसा, कब, क्या बोल रहे हैं.. और ठीक उसी तरह जिस तरह एक इंजीनियरिंग का छात्र अपने फाईनल एक्जाम में खिड़कियों के बाहर झांकता हुआ सोचता है कि शायद आसमान में कहीं उसे सवालों के जवाब मिल जाएँगे..
भगवान से गुहार करता हुआ गायक कहता है कि उसकी वाट लग गयी है जिसे सीधे, सरल और सलीके वाले शब्दों में कहें तो “दुर्गत हो गयेली है” (मून्ना भाई आपको थैंक्स यार!!)
वो भगवान के सामने कुछ तथ्य पेश करता है जिससे उसके ऐसी दुर्गति होने की पुष्टि होती है..
वह कहता है कि उसके हाथ में कटोरा है (जिसका कारण हम वीडियो में गायक की हालत देख कर लगा सकते हैं कि वह ट्रेनों में घूम-घूम कर कटोरे में पैसे बटोरता है और डी.के.बोस, डी.के.बोस का जाप करते वक्त मार खाता है इसी कारण उसकी एक आँख भी काली हो गयी है..) जब वो अपने कटोरे में झांकता है तो बटोरे हुए पैसों की जगह उसे कुआं नज़र आता है और उसके सारे पैसे गायब हो जाते हैं.. और वह फिर से डी.के.बोस का जाप शुरू कर देता है..
वह यह भी कहता है कि बिल में घुसने वाले चूहे को, जैसे ही वह दुम से पकड़ने की कोशिश करता है तो वह काला नाग निकलता है.. परन्तु इस बात कि पुष्टि नहीं हो पायी है कि बिल में घुसने वाले चूहे या सांप से उसके क्या ताल्लुकात हैं जो वह उसे दुम पकड़ के छेड़ने की कोशिश करता है..

किसने किसको लूटा, किसका माथा कैसे फूटा
क्या पता, we dont have a Clue
इतना ही पता है, आगे दौड़ें तो भला है
पीछे तो, एक राक्षस फाड़े मुंह
एक आंधी आई है, संदेसा लायी है
भाग-भाग डी.के.बोस…

गायक अभी भी भाग रहा है और अपने डी.के.बोस के जाप को जारी रखे हुए है.. उसके दो छुछुन्दर जैसे साथी इस भाग और राग में उसका पूरा साथ दे रहे हैं..
इन पंक्तियों में गायक अपने हिंसक प्रवृत्ति को जागृत कर रहा है और मरने-मारने की बात बता रहा है..
उसे पूरी दुनिया में किसी से कोई सारोकार नहीं है.. चाहे सरकार जनता को घोटाले कर के लुटे या फिर रामलीला में रावणलीला हो, उसे इन सब से कोई मतलब नहीं है और इससे वह अपने खुदगर्ज़ होने की बात को भी जग-जाहिर कर रहा है…
उसे केवल एक ही बात पता है और वो है यह कि उसके पीछे एक राक्षस पड़ा है और यह बात उसे भागते-भागते पता चली जब एक आंधी ने यह संदेसा दिया है.. शायद इसे ही विज्ञान का कमाल कहेंगे कि दूरसंचार अब बेतार हो चुका है और अब तो आंधियां भी संदेसा ले कर घूमती हैं.. इन पंक्तियों से विदेशी वैज्ञानिकों में खलबली ज़रूर मचेगी पर क्या करें हम भारतीय सबसे तेज हैं.. आजतक से भी!
खैर भागते-भागते जाप अभी भी शुरू है.. मेरे ख्याल से अगर इतना तेज, इस १०० करोड़ की आबादी में १० इंसान भी भाग लें तो १० पदक तो पक्के हो जाएँगे ऑलिम्पिक्स में.. इस गाने से सभी धावकों में एक नए रक्त का संचार हुआ है..

हम तो हैं कबूतर, दो पहिये का एक स्कूटर ज़िन्दगी
जो धकेलो तो चले
अरे किस्मत की है कड़की, रोटी, कपड़ा और लड़की, तीनों ही
पापड़ बेलो तो मिले
ये भेजा garden है और tension माली है
मन का तानपुरा, frustration में छेड़े एक ही राग
भाग-भाग डी.के.बोस…

गायक के पिता ने उसकी उपमा करनी अभी भी नहीं छोड़ी है.. वह उसे कभी कबूतर, तो कभी स्कूटर से तोल रहे हैं.. गायक कहता है कि यह दो पहिये का स्कूटर तो धकेलने से ही चलता है जिसमें एक गहन विषय को बड़ी बारीकी से छेड़ा गया है.. इसमें सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाई गयी है जो हर २ हफ्ते में पेट्रोल और तेल के दाम बढ़ा रही है और डी.के.बोस जैसे आम इंसानों को कितनी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है..
पर ख़ुफ़िया गीतकार के हवाले से यह भी पता चला है कि स्कूटर सिर्फ धकेलने से ही चलती है क्योंकि इन तीनों का भार केवल ट्रैक्टर ही उठा सकता है.. बजाज और वेस्पा तो २.५ लोगों के लिए ही बना था.. पर इन्होंने अपनी भारतीयता का इस्तेमाल करने की कोशिश की और इसलिए ऐसी मुसीबत में फंस गए हैं…
अगली पंक्ति में देश भर के नौजवानों की बात खुले दिल से गायक ने की है.. इससे पहले सभी भारतीय और नेताओं के लिए ३ सबसे अहम चीज़ें रोटी, कपड़ा और मकान हुआ करती थीं.. पर गायक ने पुरानी प्रथाओं को तोड़ते हुए नयी मिसाल कायम की है और कहा है कि किस्मत उसकी आज भी आज से ५० साल पहले जैसी खराब है जब रोटी, कपड़ा और मकान नहीं मिलता था.. आज उसे रोटी, कपड़ा और लड़की की कड़की जान पड़ती है..
इसमें भी एक गहन विषय को बहुत ही ख़ुफ़िया तरीके से छेड़ा गया है.. महंगाई के कारण रोटी और कपड़े की कड़की हो रही है और लड़कियों के प्रति अत्याचार और उनके क़त्ल होने के कारण लड़कियों की कमी महसूस की जा रही है.. पर ऐसी गहराई की बातों को भी सिर्फ कुछ विरले ही समझ पाते हैं..
फिर गायक कहता है कि पापड़ बेलने से उसे इन तीनों चीज़ों के मिलने से कोई नहीं रोक सकता.. रोटी और कपड़े का तो ठीक है पर पापड़ और लड़की मिलने का क्या सम्बन्ध है इस बारे में ख़ुफ़िया गीतकार के पास भी कोई जानकारी नहीं है.. शायद गायक जिस लड़की को चाहता है, उसे पापड़ बहुत पसंद हैं..
आगे गायक ने अपने शरीर पे ही खेती शुरू कर दी है (शायद उसकी ज़मीन सरकार ने छीन ली है).. वह अपने बालों को गार्डन और रोटी, कपड़ा और लड़की न मिलने से उत्पन्न हुए दिमाग में गंभीर कम्पन्न जिससे अंदर की कोमल नाड़ियाँ में तनाव पैदा हो गया है, उसे वह अपने बालों से भरे सर को जोतने की बात कर रहा है.. इसका सीधा असर उसके मन पर होता है जो उस कम्पन्न से पैदा हुए तरंगों से एक तानपूरे की तरह कार्य कर रहा है और वह एक ही राग छेड़ रहा है जिसके बोल हैं डी.के.बोस, डी.के.बोस, डी.के.बोस…

तत्पश्चात गायक और उसके दो साथी साभी साजों-गाजों को छोड़ कर भाग जाते हैं…

इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका यह गीत सरकार के मुंह पर तमाचा है और साथ ही साथ सभी युवाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत है जो ऑलिम्पिक में भाग ले कर देश का नाम ऊँचा करना चाहते हैं या फिर पापड़ बेल कर रोटी, कपड़ा और मकान… ओह माफ करियेगा लड़की की कड़की को मिटाना चाहते हैं..

*अभी-अभी: “मकान” की जगह “लड़की” इस्तेमाल करने का राज़ भी उजागर हो चुका है.. सरकार ने गृह-ऋण बढ़ा दिए हैं जिस कारण गायक ने मकान की आशा छोड़ दी है और उसे लगता है कि लड़की से शादी करते वक्त वह दहेज में मकान मांग लेगा.. एक तीर से दो निशाने! वाह! 🙂

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भारत, मेरी सोच, समाज, India, Light Comedy

बक-बक

फिर से आ टपका हूँ मैं ब्लॉग-जहां में.. किसलिए?
अरे बस ये मत पूछिए.. बस यूँ समझिये की इधर से गुज़र रहा था तो सोचा की आप सबको साष्टांग प्रणाम करता चलूँ.. आशीर्वाद दिए बगैर भागिएगा मत यहाँ से..
बहुत दिनों से सोच रहा था कि क्या लिखूं? क्या लिखूं? कुछ पल्ले नहीं पढ़ रहा है.. तो ऐंवे ही चला आया खाली हाथ.. आम आदमी की तरह हूँ.. खूब सोचता हूँ, बकता हूँ और फिर खाली थैला ले कर घर आ जाता हूँ.. कभी कभी लगता है नौकरी ने दिमाग में जंग लगा दी है.. कुछ सूझता ही नहीं है.. सृजनात्मकता की तो भैया वाट लग गयी है.. बड़ा भारी रोना है.. ऑफिस में ऑफिस राजनीति में लिप्त रहते हैं, बाहर जाते हैं तो भारतीय राजनीति की नेतागिरी करते हैं और घर जाते हैं तो रिश्तेदारों के साथ नेतागिरी.. यानी सृजनात्मकता की जगह नेतागिरी ने ले ली है.. विडम्बना!
खैर एक-दो बातें ही बताऊंगा आज..
सप्ताहांत में कलाकारी में समय दे रहे हैं.. दिल्ली में काफी बेहतरीन कार्यक्रम हो रहे हैं संगीत और कला सम्बन्धी.. यह देख कर अच्छा लगता है कि युवा जनता भी काफी तादाद में शास्त्रीय संगीत सुनने आ रही है और इसमें दिलचस्पी फिर से बढ़ रही है पर जब बात आती है सीखने की, तो अच्छे गुरुजनों का मिलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होता जा रहा है डॉन की तरह.. जब तक कला सीखाई नहीं जाएगी तो वो आगे कैसे बढ़ेगी? केवल युवा वर्ग को कोसने से तो काम नहीं चलेगा.. कला को जीवित रखेने के लिए उनसे बात करनी पड़ेगी और उन्हें सही मार्गदर्शन देते हुए ही मंजिल पायी जा सकती है.. ज्ञान बांटने से बढ़ता है चाहे फिर वो पढाई-सम्बन्धी हो या फिर कला-सम्बन्धी.. इस बात की बहुत कमी जान पड़ती है.. कुछ करना होगा.. हमारी कोशिश जारी है और अगर आप भी अपने सुझाव से इसमें हम युवाओं की मदद करें तो इससे बेहतर और बात कुछ नहीं होगी..
और फिर ये:
अभी एक दोस्त से मिला कुछ दिनों पहले.. सिंगल एंड मिन्गल वाले वर्ग का.. फिल्मों ने उसे इतना बेवक़ूफ़ बनाया है कि सही ज़िन्दगी में भी उन हरकतों को कॉपी करने की कोशिश करता है.. कहता है कि किसी पिक्चर में देखा था कि हीरो जानबूझकर अपने गालों पर या नाक पर क्रीम या सॉस लगा लेता है और फिर हिरोईनी बड़े प्यार से अपने हाथों से उस गाल/नाक वाले दाग को धोती है.. और फिर दोनों में प्रेम हो जाता है और फिर कुछ सालों बाद वो हीरो के कपडे धोती है..
इससे वह बड़ा प्रभावित था और बहुत प्रेरणा मिली की वो भी कुछ कर गुज़रे.. वो तो भला हो किस्मत का की कुछ करा तो सही, पर गुज़रा नहीं.. उसने अपनी दोस्तनी को भी इसी जाल में फंसाने की कोशिश की और जब उससे मिलने गया तो अपने गालों में क्रीम का एक निशान जानबूझकर छोड़ दिया.. दोस्तनी ने भी शायद वो पिक्चर देख रखी थी.. चालाक निकली.. उसने न हाथ लगाया और न ही उससे कुछ कहा.. वो बेचारा बार-बार इशारे से उस निशान को दिखाने की कोशिश करता रहा पर वह बड़ी ही अदायगी से नज़रअंदाज़ करती रही..
आस-पास वाले देखते जाते और हँसते जाते.. कुछ देर बाद रेस्टरूम जाने के बहाने दोस्तनी कट ली और बाद में मैसेज कर दिया कि कपडे धोने वाली बाई रख लो..
बेचारे का उल्लू सीधा हो गया और मुन्नी नाम न होते हुए भी बदनाम..
हम बोले, भैया सब ठीक है पर वो ३ घंटे में जो उल्लू बनते हो न, उसको वहीँ हॉल में छोड़कर आया करो.. यहाँ-वहां ले लेकर मत घूमो.. सब उस उल्लू को सीधा करते फिरेंगे..
तो वो बोला, गुरु सही कह रहे हो पर अब क्योंकि मेरा दिल टूट गया है तो क्या मैं रॉकस्टार बन सकता हूँ जैसे रणबीर कपूर बन गया था? मैंने अपना सर पकड़ने की बजाए, उसका सर पकड़ा और तबियत से टेबल पर दे मारा.. तब जा कर उसकी अकाल ठिकाने आई और वो शाष्टांग प्रणाम करता हुआ रुखसत हुआ… हमने तो उसे दिल से आशीर्वाद दे दी की वो जल्दी से बकरा बन जाए और शादी के लड्डू खाए..
अब आप भी ज़रा तबियत से इस नादान परिंदे को आशीर्वाद दे जाएं (कि मैं सृजनात्मकता की ओर फिर से आ पाऊं).. मुझे कोई घर बुला रहा है…. (ओ नादान परिंदे घर आ जा.. आआआ)….
जय राम जी की!
(नोट: अब चूँकि मैंने दो बातें बताई हैं तो आप भी २ टिप्पणी दे कर जाएं.. इसी बहाने टिप्पणियों के बाढ़ से मैं सराबोर हो जाऊंगा.. क्योंकि मुझे पता है कि मेरी ख़ुशी में ही आपकी ख़ुशी है.. नहीं? :D)
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मेरी कविताएँ, Light Comedy

रजनी चालीसा

आज कल रजनीकांत पर बहुत सारे एस.एम.एस और दो लाईना बन रहे हैं.. भैया अब वो हैं ही ऐसे कमाल के..६१ साल में ऐसे-ऐसे कारनामे अपनी फिल्मों में जो करते हैं.. नव-कलाकारों की तो सिट्टीयां और पिट्टीयां सब गुम हो गए हैं.. रजनीकांत ने जितनी मेहनत और निष्ठां से फ़िल्मी जगत को एक से बढ़ कर एक सुपर-हिट पिक्चरें दी हैं.. जितनी सराहना हो, कम है..
पर जनाब इनके ऊपर बन रहे एस.एम्.एसों ने तो धमाल ही मचा रखा है.. ऐसा कहना गलत होगा कि इन सब एस.एम्.एसों में उनके खिलाफ कुछ कहा जा रहा है… बस कुछ हंसी-मज़ाक और क्या?
वो कहते हैं न – “जो चुटकुला आप पर बने और जिसे सुनकर हज़ारों लोग हँसे.. उससे बेहतर चुटकुला दुनिया में नहीं है.. कम से कम आप पर ही सही.. पर इतने लोग हँसे तो सही”

तो मैंने भी सोचा कि चंद पंक्तियाँ लिखूं इस महान कलाकार पर:
(आप सब से गुजारिश है कि इसे अच्छी मंशा में ही लें.. मैं किसी के खिलाफ कुछ नहीं लिख रहा हूँ)
तो रजनीजी के ऊपर प्रस्तुत है..

“रजनी चालीसा”

चाहे मुन्नी कितनी भी बदनाम हो
चाहे शीला की जवानी पूरी चढ़ी परवान हो
चाहे ए.सी.पी प्रद्युमन उसपर बन रहे एसेमेसों से परेशान हो
पर पूरी दुनिया फिर भी कहेगी..
Oh My रजनी Only तुस्सी महान हो!
पूरे भारत की शान हो!
Einstein के लिए बेईमान हो!
Newton के लिए हैवान हो!
Surprises की खान हो!
दुनिया की श्रृष्टि-गान हो!
मुर्दों में दौड़ती जान हो!
बेसुरों की टोली की तान हो!
इंजीनियरिंग कॉलेज के मेस की नान हो!
रात को लेते जल-पान(नाश्ता) हो!
Tsunami के सामने उफान हो!
मूक के लिए ज़बान हो!
बहरे के लिए कान हो!
सूरज को Supply करने वाले भान हो!
Even राखी के लिए मान हो!
पानी में तैरता वायुयान हो!
कुम्भ में वीरान हो!
गिनीज़ बुक के लिए हैरान हो!
साइकिल के लिए कटने वाली चलान हो!
दुनिया की सबसे समतल ढलान हो!
खली के लिए पहलवानी की दुकान हो!
रिकी पॉन्टिंग को लगे, उससे भी बड़े बेईमान हो!
ब्रैड पिट से भी ज्यादा जवान हो!
पर जो भी हो…
Completely Made In हिंदुस्तान हो!
और हम सब के लिए धरती वाले भगवान हो!
Oh My रजनी.. तुस्सी Gr8 हो! महान हो!
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