भारत, मेरी सोच, मैं और जिंदगी..., समाज, India

सब धंधा है!

भईया, हमारी मानो तो सब बिजनस है, बिजनस। जहाँ आँख गड़ती है, कारोबार ही नज़र आता है। जहाँ चलता हूँ, लोग दर-मुलाई करते हुए पाए जाते हैं। घर-चौराहा-शहर-ऑफिस-संसद-सरहद, हर जगह धंधे की बू आती है। सबको जैसे मुनाफा कमाना है और उसी मुनाफे से स्वर्ग की टिकट का बिजनस करना है।

भौतिकवादिता का उड़ता तीर जिस तरह हमने कुबूला है, अपनी इस सुन्दर कृति को ऐसा देख कर… ख़ुदा भी आसमां से जब ज़मीं पर देखता होगा… क्या से क्या हो गया… ये क्या हुआ, कैसे हुआ, कब हुआ, क्यों हुआ। ऐसी हालत में ऊपरवाले का मदीरापान करना निषेध नहीं हो सकता। डूबते और दुखते को पहले मय का सहारा और तत्पश्चात् किसी दोस्त का सहारा।

आजकल तो अंतरजालीय संचार माध्यम (असमा) यानी कि सोशल मीडिया पर हर पोस्ट बिकाऊ लगता है। कौन किसके बारे में क्या पेल रहा है, अच्छा, बुरा, गलत, सही, जैसा भी हो, सब जैसे मुनाफ़े की कोई तरकीब और जुगत लगा रहे हों।

सब धन में मगन हैं
न चैन, न अमन है
खरीदना सबको गगन है
बस एक अविरल अगन है
सब धन में मगन हैं

अरे महाशय, जब सैनिकों की अर्थियों की भी लोग दूकान खोल लें तो फिर बाकी सबके बारे में कहना मक्कारी होगी। हर मौत पर हाय-तौबा मच रही है, लोग चिल्ला रहे हैं, खबरिया चीख रहे हैं, नेता-अभिनेता मौकों को तलाश रहे हैं और हम जैसे टिटपुन्जिये लेखक भी ऐसे विषयों पर लिख कर पैसे कमाने की होड़ में लगे हुए हैं। मैं ना कहता था, सब धंधा है? कोई दहेज ले कर शादी का धंधा कर रहा है तो कोई झूठी दहेज की साज़िश रचकर शादी का धंधा कर रहा है। सब वेश्यावृत्ति हो चली है जनाब, संभल जाईये।

अगर अभी तक आप इस लपेटे में नहीं आएँ हैं तो जल्द ही आएँगे और अगर बचना चाहते हैं तो सिर्फ एक ही उपाय है। संन्यास ले लीजिये। जी हाँ, सही पढ़ा। फकीर बन जाइए। घुस जाइए घने जंगलों की आड़ में जहाँ किसी कारोबारी को आपकी बू तक न आए नहीं तो वो वहाँ आ कर आपका भी धंधा बना डालेगा। दिक्कत यही है कि कम्मकल ये नए तरह के कारोबारियों को बिजनस करने के लिए अब दूकान खोलने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। ये छोटा-अदना सा जो चल-अचल, तार-रहित, तेज-बोंगा यंत्र आपके हाथ में है ना, बस यही सब हड़कंप की जड़ है।

ये बिजनस की बिमारी इसी यंत्र से फैलती है। चाहे सीने से लगाइए, चाहे लंगोट की जेब में रखिये, चाहे कानों पर चिपकाइए, ये बिमारी आपको कैसे भी जकड़ लेगी। और ऊपर से मशक्कत ये कि आज के ज़माने में अगर ये आपके पास न हो तो लोग बोलेंगे,
“क्यों, बाबा आदम के बाबा हो क्या?”
“क्यों, शेर शाह सूरी के चचा हो क्या?”
“क्यों, रानी एलिज़ाबेथ की दाई माँ हो क्या?”
जब ऐसे ताने सुनेंगे तो आदमी अपनी एक क्या, दोनों गुर्दे निलाम कर देगा पर इस यंत्र को फेफ़ड़ों से लगा लेगा, तभी जा कर उसके सीने को ठंडक मिलेगी।

देखिये, मैं हूँ लेखक, और मेरा काम है आपको आगाह करना। मेरा दायित्व कोई सामाजिक बदलाव का थोड़े ना है। उसका ठेका तो पहले से ही बुद्धिजीवियों ने हड़प रखा है। मैं तो बस लिखता हूँ और चुप हो जाता हूँ नहीं तो कल हमारी अर्थी की खबर भी छप जाएगी और आप सब मिलकर उसपर भी दूकान खोलकर बैठ जाएँगे और मन ही मन मेरी बात याद करेंगे, “मैं न कहता था, सब धंधा है!”

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रिसता यौवन

कब इस शांत-लहर-डर मन में उद्वेलित सुनामी जागेगी?
इस घुटते मरते यौवन में कब चिंगारी सी भागेगी?

काला अँधा सा ये जीवन, कैसा है यह बिका बिका?
क्यों हर चेहरा मुरझाया सा, क्यों है हर तन थका थका?
कब दौड़ेगी लाल लहू में, इक आग यूँ ही बैरागी सी?
स्फूर्ति-समर्पण-सम्मान सघन सी, निश्छल यूँ अनुरागी सी
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

आँखें देखो धँसी-फटी सी, अंगूठे कैसे शिथिल-कटे
कपड़े ज्यों रुपयों की माला, आत्म-कपड़े चीथड़े-फटे
कब तक बिकेगा ये स्वर्णिम यौवन, यूँ ही कौड़ी कटोरे में?
आँखें तेज़, ऊँचा सीना, कदम हो विजयी हिलोरे ले
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

क्यों है सोया-खोया जवां ये, आँखें खोले, खड़े हुए?
देखते नहीं सपने ये जिनमें, निद्रा-क्लांत हैं धरे हुए?
कब इन धूमिल आँखों का जल, लवण अपनी उड़ाएगा?
स्पष्ट निष्कलंक हो कर के फिर से, सच्चाई को पाएगा
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

कैसा है ये स्वार्थ जो इनमें, अपने में ही घिरे हुए
५ इंच टकटकी लगाए, अपनी धुन में परे हुए
ज़िन्दा है या लाश है इनकी, नब्ज़ें ऐसी शिथिल हुई
हकीकत की लहरा दे सिहरन, कहाँ है वो जादुई सुई?
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

भौतिकता में फूंकी जाती, देखो जवानी चमकती सी
बस पहन-ओढ़-खा-पी के कहते, ज़िन्दगी है बरसती सी
कब बिजली एक दहकती सी, इस भ्रांत स्वप्न को फूंकेगी?
फिर जल-बरस बेहया सी इनपर, यथार्थ धरा पर सुलगेगी
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

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बुरा तो मानो… होली है!

आजकल लोग बुरा नहीं मान रहे, क्या बात हो गयी है ऐसे? अभी कुछ दिन पहले तक तो लोग सुई गिरने पर भी हल्ला बोल मचा देते थे। अभी कल ही एक दोस्त मिला कई अरसे बाद। मैंने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई कि अब शादी हो गई है तो मिलता नहीं है, जोरू का गुलाम हो गया है, बीवी आते ही दोस्त बेकार हो गए? मुझे लगा कि वो अब आहत हो, तब आहत हो, पर मुए ने सिर तक न हिलाया, मुस्कुराता रहा। मुझे लगा था कि अब बोलेगा, या भड़केगा या बचाव करेगा पर नहीं, जनाब ने मुझे चारों खाने चित कर दिया था। मैं मायूस हो गया और उसके बजाय खुद ही आहत हो लिया। फिर मुझे लगा शायद शादी की डसन ने बेचारे को ज़्यादा उत्तेजित होने की कला से विरक्त कर दिया है तो मैं अपने रास्ते हो लिया।

आजकल फैशन में बुरा मान जाना बहुत चल रहा है इसलिए अगर कोई ऐसा नहीं मानता तो उसके खिलाफ तो मैं खुद ही बुरा मान जाता हूँ कि उसने बुरा क्यों नहीं माना? भई, समाज भी कुछ होता है! हमें बचपन से संस्कार मिला है कि समाज के साथ चलो, उसके जैसा करो, तब समाज आगे बढ़ेगा और तुम भी समाज की नज़रों में हवाओं पर उड़ोगे। बस इसलिए जो समाज में फैले फैशन के खिलाफ जाता है तो हम आहत हो जाते हैं। मैं तो कहता हूँ कि बच्चा परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो तो उसके शिक्षकों से ले कर, माँ-बाप, रिश्तेदार इत्यादियों को भी तुरंत आहत हो लेना चाहिए। इससे समाज का संतुलन बना रहेगा। नहीं तो क्या है कि बच्चा भी घबरा जाएगा कि लोग बुरा क्यों नहीं मान रहे हैं। हमें उस बच्चे की मानसिक हालत की हवा नहीं निकालनी है तो बुरा तो मानना ही होगा। आखिर अनुत्तीर्ण होना तो घोर अपराध है जिससे उसका जीवन व्यर्थ हो सकता है और समाज बर्बाद।

सुबह-शाम, दोपहर-रात, घर-ऑफिस, बस-ट्रेन, मालिक-नौकर, आदमी-जानवर, इत्यादि सभी मौकों और परिस्थितियों को हम आहतों के अनुकूल बना रहे हैं जो कि एक प्रशंसनीय कदम है। एक दोस्तनी को २ दिन तक मेसेज का जवाब नहीं दिया तो तीसरे दिन बुरा लगने का मेसेज आ गया और लिखा था कि वो २ दिन तक कुढ़ती रही थी और वो मुझसे बहुत आहत है क्योंकि मैंने उसके “कैसे हो?” का जवाब नहीं दिया था। मैंने उसे जवाब में लिखा, “मुझे तो तुम्हारा मेसेज ही नहीं मिला और तुम यूँ ही आहत हो ली? फ़ोकट में आहत हो कर कैसा लग रहा है? वैसे भी आजकल चलन में है। 😀” उसका जवाब तो अभी तक नहीं आया है। शायद कुछ दिन और कुढ़ेगी। कुढने दीजिये, अच्छा है समाज के लिए। इसी सिलसिले में ४-५ और लोगों को आहत करेगी और ये कड़ी को बढ़ाने में मदद करेगी।

और ये देखिये, बुरा मानने वाला तो सबसे बड़ा त्यौहार भी आ रहा है। मैं तो कह रहा हूँ कि होली की टैगलाइन को बदल कर “बुरा तो मानो होली है!” कर देना चाहिए क्योंकि बुरा मानने वालों की जमात अभी बहुमत में है। इससे सुनहरा मौका नहीं मिलेगा इस आहती सोच को बढ़ाने में। मार्केटिंग के ज़माने में टाइमिंग भी आखिर कोई चीज़ होती है। होली के दिन अगर कोई घर पर आ कर बाहर निकलने को कहे तो साफ़ कह दें कि इस बार वो होली नहीं खेलेंगे क्योंकि वो सरकार से आहत हैं कि उसने अपने वायदे पूरे नहीं किये या फिर कह दें कि इंद्र देव ने बिन मौसम “बरसो रे मेघा” कर दिया इसलिए वो नाक-भौं सिकोड़े बैठे हैं या फिर कह दें कि ओबामा ने भारत के खिलाफ जो बयान दिया है वो उनके गले नहीं उतरी है इसलिए इस साल वो अपने गले से भांग भी नहीं उतरने देंगे। कहने का मतलब है कि टुच्ची से टुच्ची बात के लिए भी अब हमको बुरा मान लेने की आदत डालनी पड़ेगी।

कोई कुछ ट्वीटता है तो ५० लोग हंगामा कर बैठते हैं, उन ५० लोगों के खिलाफ फिर १०० लोग हल्ला बोल देते हैं और फिर उन १०० के खिलाफ… आप समझ रहे हैं ना? बस यही जो कड़ी-दर-कड़ी, ट्वीट-दर-ट्वीट, पोस्ट-दर-पोस्ट, बयान-दर-बयान बुरा मानने का सिलसिला चल रहा है इसे हमें तब तक ख़त्म नहीं होने देना है जब तक हम ना ख़त्म हो लें। वैसे भी आजकल दिन भर का रोना हो गया है कि ज़िन्दगी बेकार हो गई है, नौकरी बेजान सी है, कोई आपको प्यार नहीं करता, आप ४ घंटे ट्रैफिक में बिताते हैं और भी न जाने क्या क्या। इसलिए इसका सबसे बढ़िया उपाय इन सबसे ऊपर उठने की बजाय आहत हो हो कर मर जाना अच्छा है। नहीं? अरे, अरे, आप तो बुरा मान गए। खैर मंशा तो मेरी यही ही थी।

देखिये अब मैं तो कहता हूँ कि आप ये पोस्ट पढ़ कर जबरदस्त ढंग से बुरा मान जाएँ कि इस पोस्ट से तो समाज में नकारात्मकता फैल रही है और इस पोस्ट को पढ़ कर कितनों की ज़िन्दगी तबाह हो जाएगी। और हाँ इस बुरा मानने के सिलसिले में ब्लॉग का लिंक भी फैला दीजियेगा। क्या है ना कि मार्केटिंग का ज़माना है और हमें फ़ोकट की मार्केटिंग बहुत पसंद है ठीक उन्हीं की तरह जो बे सिर-पैर की बयानबाजी से आपको आहत किये जा रहे हैं और आप उनकी फ्री फ़ोकट मार्केटिंग। अरे रे ये तो राज़ की बात खुल गई। वैसे कोई बात नहीं, आप तो हमारे मित्र हैं। मैं बुरा नहीं मानूँगा।

नोट: अभी अभी हमारी दोस्तनी का जवाब आ गया है। कह रही है कि उसने मुझे सोशल मीडिया पे हर जगह ब्लॉक कर दिया है। मुझे तो वैसे भी धेला फर्क नहीं पड़ रहा था। चलिए मगझमारी कम हुई एक 🙂
आपको होली की शुभकामनाएँ। खूब होली खेलिए-खिलाइए और लोगों को बुरा मनवाइये और ज़ोर से बोलिए, “बुरा तो मानो…”

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बड़ा शहर vs अपना शहर

एक शहर है, बहुत विशाल, लोगों से भरा, लोगों से डरा, मकानों से पटा, सटा-सटा। ये शहर ‘बड़ा शहर’ है। एक है इसका उलट, छोटा सा, आधे घंटे में एक छोर से उस छोर, कम लोग, नीचे मकान, खाली सड़कें, बिलकुल विपरीत, ‘छोटा शहर’

मस्त, अपना शहर vs व्यस्त बड़ा शहर (चित्र साभार गूगल)

अभी मैं बड़े शहर का बाशिंदा हूँ, या यूँ कहें कि यहाँ एक मुसाफिर हूँ। हाँ मुसाफिर ही कहूँगा। यह एक बस स्टॉप की तरह है। भीड़-भाड़, गन्दगी, दहशत, संदेहास्पद मुसाफ़िर और लोगों का आना जाना। यहाँ पर शहर का लोगों पर ज़ोर है। उसी के हिसाब से लोग चलते हैं। लोगों को शहर का खौफ़ है। वो शहर जो खुद तो अदृश्य है पर लोगों पर हुकूमत चलाता है, भगवान की तरह?

मेरे जैसे मुसाफ़िर जो छोटे शहरों को अपना दिल बेच चुके हैं, उनको यह बस स्टॉप कभी पसंद नहीं आ सकता। यहाँ लोग दौड़ते-भागते रहते हैं, मुझे तो लोगों को ठहरे हुए देखने की आदत है, उनके चहरे को पढ़ने की आदत, उनके भावों को समझने की आदत, उनसे बतियाने की आदत, उनके साथ चाय पीने की आदत। ये आदत बड़े शहरों में ख़राब हो गई है। कोई रुकता ही नहीं है जिसको मैं समझ सकूं, जो मुझे समझ सके। कोई रुकता नहीं है ५ मिनट के लिए जिससे दोस्ती कर सकूँ, जिसके साथ चाय पी सकूँ। यहाँ लोग चाय कॉफ़ी पर तभी मिलते हैं जब उन्हें कोई काम निकलवाना होता है। छोटे शहरों में जब कोई काम नहीं होता तो चाय पर मिल जाते हैं, अक्सर हर शाम।

बड़े शहरों में ऊँची ऊँची दीवारें है। घरों और दिलों, दोनों के बीच। न तुम मुझे जानते हो, न मैं तुम्हें। “क्या तुम मेरे पड़ोस में पिछले १ साल से रह रहे हो? कभी गौर नहीं किया।” ये आम वाक्य है लोगों के। छोटे अपने शहर में कोई एक दिन के लिए भी अनजान नहीं रहता। मैं अपने मोहल्ले में सबको नाम से जानता हूँ, पहचानता हूँ। वहाँ अभी भी पैसों के लिए अनजान नहीं होते हैं। अभी कुछ समय पहले बड़े शहर में मेरे नीचे तल्ले के बाशिंदे की तबियत ख़राब हुई थी। मुझे पूरे एक हफ्ते बाद दरबान से पता चला कि वो अस्पताल में भरती हैं। अब जा कर मिलने में भी संकोच हो रहा है। कुछ चीज़ें समय निकलने के बाद करनी मुश्किल हो जाती हैं। अपने शहर में छींक आने पर भी ५ लोग पूछ लेते हैं कि क्या दवा-पानी चल रहा है और नसीहत इतनी दे जाते हैं कि बिमारी से ज़्यादा नसीहतों का डर लगने लगता है। बड़े शहर के कई मुसाफिर कहते हैं कि “यहाँ ठीक है, कोई परेशान नहीं करता अपनी नसीहतों से।” पर सच तो यह भी है कि आदमी को मरे हुए ३ दिन निकल जाते हैं और दुर्गन्ध से ही पता चलता है कि वो तो गया। ३ दिन के अंतर और नसीहतों के समंदर के बीच फैसला ऐसी घटनाओं से ही हो जाता है।

मैंने कभी अपने शहर में लोगों को हर दिन ऐसे भागते हुए नहीं देखा कि मानों पागल कुत्ता पीछे पड़ा हो। वैसे कभी-कभार कुत्ते पीछे पड़ जाते हैं तो भागना पड़ता है। बड़े शहरों में मैंने मुसाफिरों को हर दिन केवल भागते ही तो देखा है। बसों में, ट्रेनों में, ट्रकों में, मेट्रो में, गाड़ियों में, बाईकों में, सब तरफ लोगों के बीच एक ऐसी अनकही-अदृश्य दौड़ है जिसका अंत किसी को नहीं पता और न ही इस दौड़ का कोई विश्लेषण कर पाया है। मेट्रो के दरवाज़ों के खुलते ही लोग बैलून में से हवा निकलने की प्रक्रिया को हुबहू नक़ल करते हैं। ऐसा लगता है कि वो निर्जीव मेट्रो भी अब इनके निकलने पर सांस ले पा रहा है। हर तरफ अफरा-तफरी मची हुई है। कोई किससे भिड़ रहा है, कोई किससे लड़ रहा है। किसी के केश अगर किसी के हाथों को छू जाए तो लात-घूँसे चल जाते हैं। ये मुसाफिर वही लोग हैं जो छोटे शहरों से हैं। क्योंकि उन्होंने कभी इतनी भीड़ को झेला नहीं होता है तो यहाँ आ कर बौरा जाते हैं। अपने शहर में मैं केवल परिचितों से भिड़ता हूँ, यदा-कदा बाज़ार में। कभी किसी अनजान से भिड़ गया तो भी एक हँसी से बात आई-गई हो जाती है।

बड़े शहरों में लोग कमाने आते हैं पर खुद को बेच देते हैं। अपना शरीर, अपना ज़मीर। कईयों को तो इसके लिए मुँह-माँगे दाम भी नहीं मिलते हैं। अपने शहर में लोग इतनी आसानी से बिकाऊ नहीं होते हैं क्योंकि वहाँ समाज की पकड़ मज़बूत है, उसका डर है, उसकी नज़र है। बड़े शहर में समाज को तड़ीपार कर दिया गया है। यहाँ समाज बन ही नहीं सकता क्योंकि यहाँ दीवारें बहुत ऊँची हैं और ऊँची दीवारों से तो आजतक बँटवारा ही हुआ है। नहीं?

बड़े शहर के लोग हर दिन चीखते चिल्लाते हैं, शोर मचाते हैं पर दिक्कत ये है कि हर कोई अपनी शोर मचा रहा है। कोई सुनने वाला ही नहीं है। यही कारण है कि लोग दुखी हैं। उनके दुःख को वो किसे सुनाएँ? मेरे शहर में चीखने चिल्लाने की नौबत नहीं आती। संतुष्ट लोगों को सुनने की आदत ज्यादा होती है। किसी एक को सुनने के लिए हजारों कान हैं। यहाँ संतुष्टि है तो शान्ति है। वहाँ शोर है तो अशांति है।

मैं तो यहाँ सिर्फ मुसाफ़िर ही बन कर रहना चाहता हूँ। मैं कभी इस बड़े शहर को ‘अपना’ शहर नहीं कह पाऊँगा। अगर यहाँ जन्मता-बढ़ता तो शायद ऐसा हो पाता। मुझे अपने शहर पहुँचना है। वहाँ से निकला तो हूँ पर वहीँ वापस पहुँचने के लिए। कैसी अजीब विडम्बना है ये ज़िन्दगी।

वैसे एक सच तो यह भी है कि शहर किसी का नहीं होता। न मेरा न तुम्हारा। वह तो मूक दर्शक की भांति सबको देखता-तकता रहता है और मंद-मंद मुस्कुराता रहता है कि कैसे बेवकूफ है यहाँ के लोग जो उसे अपना कहते हैं जबकि वह उनके रुदन पर कभी नहीं रोता है, उनकी ख़ुशी में कभी नहीं हँसता है। पर एक सत्य यह भी है कि ज़िन्दगी को पार करने के लिए एक ऐसा सहारा चाहिए जो बस इस सफ़र तक हमारा हो। एक शहर को अपना कहकर आदमी के दिल को ठंडक मिल जाती है और उसका सफ़र थोड़ा कम कष्टदायक हो जाता है।

चलिए निकलता हूँ एक रिश्तेदार से मिलने। आज का पूरा दिन इसी मिलने के नाम है। अपने शहर में तो हम अपने सभी रिश्तेदारों से दिन में दो बार मिल आते हैं। ये बड़ा शहर मुझे कभी रास नहीं आया।

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सस्ती जान

राकेश और मोहित, पक्के दोस्त. स्कूल में ११वीं में एक साथ थे. वैसे तो दोनों मध्यमवर्गीय परिवार से थे पर युवावस्था में आ कर सभी शौकीन हो जाते हैं क्योंकि ये समय ही होता है बेपरवाह उड़ने का.

दोनों को चौपाटी में जा कर खाने का बड़ा शौक था. शहर के एक व्यस्त बाजार में सड़क किनारे खाने का वो आनंद किसे नहीं होगा? पर चूँकि यह जगह उनके घर से दूर था, तो कभी-कभार बस पकड़ के पहुँच जाते था. चंद महीनों पहले मोहित के पापा ने घर के लिए स्कूटी खरीद ली थी और मोहित के लिए ‘लर्नर्स लाइसेंस’ भी बनवा दिया था. गाहे-बगाहे दोनों इसी स्कूटी पर मस्ती मारने निकल पड़ते पर घर से यह सख्त हिदायत थी कि दोनों को हेलमेट पहनना पड़ेगा. शहर में भी यही नियम था.

घर से निकलते वक़्त तो दोनों हेलमेट पहने हुए निकलते पर अगले ही नुक्कड़ पर पीछे बैठा यात्री अपना हेलमेट अपने हाथों में टांग लेता. फिर तो बस उन चौराहों पर जहाँ पुलिस खड़ी होती, वहीँ पर हेलमेट सिर पर सजता था नहीं तो हाथ पर. कई महीनों तक ऐसा चलता रहा और अब तो यह आदत सी बन चुकी थी. वैसे भी हिंदुस्तान में जान जाने से ज़्यादा चालान कटने का डर लगता है.

बस काल को इसी एक दिन का इंतज़ार था. दोनों चौपाटी की ओर बढ़ चले थे और पुलिस चौराहा पार करते ही पीछे बैठे राकेश ने अपना हेलमेट सिर से उतारकर हाथों में टिका लिया था. सड़क के अगले कोने पर ही एक बदहवास कुत्ता न जाने कहाँ से उनके सामने आ गया और तीव्र गति में चल रही स्कूटी को मोहित संभाल न सका और कुत्ते से बचने के चक्कर में पास ही में चल रहे डिवाइडर पर स्कूटी दे मारी.

इसके बाद दोनों हवा में उछल के सड़क के उस पार और फिर मोहित को कुछ याद नहीं. शायद कई दिन बीत गए थे और आज जा कर अस्पताल में उसकी आँखें खुली. कमरे में इस वक़्त कोई नहीं था. बस एक अखबार पड़ा था जिसमें एक फोटो थी एक नौजवान की. वह गिरा पड़ा था सड़क पर और उसके हाथों में एक हेलमेट अटका हुआ था. उसके सिर से खून का तालाब सड़क पर बन चुका था. नीचे लिखा था:

“जान सिर में होती है, हाथों में नहीं” -ट्रैफिक पुलिस

साभार: गूगल

 

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हो रहा महिला सशक्तिकरण!

अनिता और पूनम पहली बार कॉलेज में ही मिली थी और समय के साथ बहुत ही गहरी दोस्त बन गयी थीं। चूँकि उनकी संकाय भी एक ही थी तो क्लास जाना, परीक्षा के लिए पढ़ना, असाइनमेंट पूरा करना, इत्यादि इत्यादि सब साथ में होता था।

जब इतनी देर साथ रहते थे तो कई सारी चर्चाएं भी दोनों के बीच होती जो कि लड़कों, रिश्तों, प्रोफेसर्स, घर, देश, इत्यादि के इर्द-गिर्द घूमता था। महिला दिवस के आसपास मार्किट में महिला सशक्तिकरण को लेकर बेहद गरम लू चली। अख़बार, टीवी, ब्लॉग, फेसबुक, हर जगह कोई न कोई अपने मन की भड़ास उढ़ेल रहा था।

चित्र: साभार गूगल बाबा

एक बार कॉलेज की छुट्टी होने के बाद दोनों घर को निकली तो रास्ते में अनिता ने कहा, “महिला सशक्तिकरण के नाम पर जो आरक्षण का ढकोसला सरकार ने किया है, वह हमें सशक्त नहीं बनाएगा।”
इसपर पूनम ने भी हामी भरते हुए कहा, “सही कह रही हो। हम लड़कियों को पुरुषों की तरफ से विशेष व्यवहार या सुविधाओं की ज़रूरत नहीं है। हम खुद में सक्षम हैं और यह हम हर क्षेत्र में करके भी दिखा रही हैं।”

दोनों में इसी तरह सरकार की नीतियों और महिलाओं को ख़ास सुविधाएं दे कर महिलाओं को और कमज़ोर करने की बात पर रास्ते भर वार्तालाप हुई और वो ऐसी व्यवस्था को कोसती रहीं।

फिर दोनों घर जाने के लिए मेट्रो में चढ़ीं और तुरंत ही महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर बैठे दो नौजवानों को उठने को कहा और खुद वहाँ बैठकर महिला सशक्तिकरण पर विचार को आगे बढ़ाने लगीं।


जब तक ऐसी पढ़ी-लिखी महिलाएं इस सशक्तिकरण का सही अर्थ ढूंढती हैं, तब तक मेरी आवाज़ में एक गीत (राबता) सुनते चलिए यहाँ पर!

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कुत्ता गोष्ठी

कुत्तों की गोष्ठी हो रही थी और आस पास वाले मोहल्लों से भी सहभागी इस गोष्ठी में शामिल हुए थे। गोष्ठी का कोई खास उद्देश्य तो नहीं था। बस अपनी-उसकी सफलताओं का अंधबखान, तालियाँ, भौंकालिया इत्यादी। गोष्ठी एक छप्पर के नीचे जमी हुई है जो कुछ साल पहले किसी भिखारी की हुआ करती थी। इसमें बस एक छप्पर है और कुछ नहीं। थोड़ी बहुत रौशनी सड़क पे लगे लैम्प से आती है और वो तब जब उसमें खुद विद्युत घुसे।
street dogs

अब चूँकि ये गली के कुत्ते हैं तो इनके कारनामे भी वही छोटे-मोटे नेताओं जैसे। जैसे लोकल नेता अपने चार-पांच चमचों को ले कर गुंडागर्दी करके अपने आपको तीसमारखां समझते हैं, ठीक वैसे ही ये गली के कुत्ते भौंकाली झाड़ रहे हैं।
एक कहता है, “कुत्ते भाईयों, अभी ४ दिन पहले की ही बात है, एक मरियल मोबाइल पर खिसियाता हुआ जा रहा था। इधर मैंने बंटी और चंटी को इशारा किया तो दोनों भी सतर्क हो कर इसके पीछे हो लिए। आगे वाले कचरा डब्बे के बाजू में जो नाला है ना, ठीक उसी के पास पहुँचते ही हमने यात्री को भौंका कर चौंका दिया। बेचारे का मोबाइल छपाक से नाले में। बाऊहाहाहा, हम कुत्तों की तो घिग्घी बंध गयी। बिन मोबाइल के बकरे की हालत देखने की थी।
इतने में चौथा कुत्ता भौंकलाया और बोला, “वाह कुत्ते भाई, उसके बाद की कहानी भी तो बताओ। जो उसने तीन पत्थर उठा कर तुम तीनों पर बरसाए थे तो कैसे मिमियाते हुए भागे थे उलटे चारों पैर? कम्मकल तुम्हारे कारण मुझे भी वहाँ से कटना पड़ा था। अच्छा भला मैं बासी ब्रेड-मक्खन खा रहा था। वो करमजली मेमसाहब ने ऊपर से फेंका था। मैंने देखा, बिल्ली ले गयी ब्रेड मेरे निकलते ही”
पहला कुत्ता थोड़ा हड़बड़ाता हुआ बोला, “अब यार थोड़ा रिक्स तो उठाना पड़ता है ना। कभी-कभी कुछ तूफानी करते हैं और उसमें भी तुमको नुक्स दिख रहा है। हः!”

इतने में दूसरे मोहल्ले से आये २-३ कुत्ते अपनी कथा बघारने लगे। बोले “अमा तुम तो बस नालों में ही ऐश करो। हम ३ ने तो कल एक ऑटो वाले को जो दौड़ाया है, बेचारा ऑटो को ट्रक की तरह उड़ा ले गया। वो तो हमने अगले कट पर उसको छोड़ दिया। कुत्ता-बॉर्डर आ गया था ना, नहीं तो उसके ऑटो को पलटा कर ही छोड़ते। अरे हमने इतने साइकिल, ऑटो, अल्टो, नैनो, बाईक्स को पछाड़ा है कि तुम्हारी बिसात ही क्या। तुम कुत्ते गन्दी नाली के टुच्चे आदमी….”
‘आदमी’ बोलना था कि दोनों गुटों में घमासान छिड़ गया। कुत्ता वार हो गया और पूरा मोहल्ला हिल गया। तभी एक दरबान ये लंबा डंडा ले कर आया तो दोनों ओर के कुत्ते पिलपिलाते हुए भगे और अपने-अपने बिलों में घुस गए।

कुछ दिनों बाद एक और कुत्ता गोष्ठी हुई पर इस बार रईस इलाके के कुत्तों की। वहाँ की तो शान भी देखते बनती थी। चारों ओर हड्डियां अलग-अलग आकारों में सजी हुई, इलाके के सामुदायिक केन्द्र की मखमली घास पर हलकी-हलकी रौशनी आते हुए, कुत्ते विदेशी मार्का वाले पट्टे पहने हुए, कुछ तो ऊनी मफलर ओढ़े हुए, लगता था मानों रईसों की ही कोई मीटिंग हो। कोई ज़्यादा भौंकना-गुर्राना नहीं, तहजीबों की महफ़िल थी।
इसको कुत्तों की किटी पार्टी कह सकते हैं। ये भी हफ्ते में एक बार मिलते हैं। अपनी रईसी दिखाते हैं और अपनी-अपनी महंगी कारों में बैठ कर चले जाते हैं।
rich_dogs

एक जनाब-ए-कुत्ते ने फरमाया, “हे गाईज़, आप लोग को पता है कल मैंने कौन सी गाड़ी को खदेड़ा?” सब भौंकचक्के से उसको देखते हैं और वो अपनी भारी गुर्राहट में कहता है “मर्सिडीज़ बेंज” और सबकी आवाज़ स्तब्धता के कारण ‘कुकुरी गुर्राहट’ से ‘मानवी आह’ में बदल जाती। उस कुत्ते के लिए सबके मन में एक इज्ज़त पैदा हो जाती है।
पर तभी दूसरे कोने में खड़े कुत्ते ने अपना जबड़ा खोला और भौंका, “इसमें क्या शाही बात है? मैंने तो कल ही एक लैम्बौरग के आगे वाले पहिये पर अपनी छपाक छाप छोड़ी” अब सारी आह मुड़कर इस नये महाशय पर आ टिकती है।
इसी तरह ये कुकुरी-किट्टी बड़े ही अदब और शालीनता से चलती रहती है। यहाँ पर बातें केवल गद्देदार गिद्दों की, आरामदायक गाड़ियों की, ममतामयी मालकिनों की और लज़्ज़तदार खाने की होती है।
सब एक से बढ़कर एक रईसकुत्जादे हैं और इनकी दुनिया हमारे गली के बाहर नाले किनारे कचरों में धंसे कुत्तों से बिलकुल भिन्न है। इन्हें उस दुनिया के बारे में कोई अंदाज़ा नहीं है और ना ही उन्हें इनकी दुनिया के बारे में। कुत्तों की जिन्दगी में अभी टीवी और फेसबुक जो नहीं आया है..

जाते जाते मेरी आवाज़ में एक गीत भी सुनते जाइए: कौन मेरा (स्पेशल २६)

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