मेरी सोच, मैं और जिंदगी..., युवा, लघु कथा, समाज

रिश्तों की डोर

रश्मि उन लाखों लड़कियों की तरह है जो आज बेबाक, आज़ाद और खुले माहौल में रहना पसंद करती हैं और रहती भी हैं। पहले पढ़ाई के लिए कई साल घर से दूर रही और उसके बाद से नौकरी करते हुए भी घर से दूर रहती है। रश्मि के मम्मी-पापा ने कभी उसके निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं किया बस अपने सुझाव भर दिए. आज एक अच्छी कंपनी के एक अच्छी पोस्ट पर रश्मि आसीन है।

जैसा कि अक्सर होता है, माँ-बाप दूर रहने वाले अपने बच्चों से दिन में दो मिनट बात कर दिल को तसल्ली दे देते हैं, वैसा ही यहाँ भी था। हर रोज़ एक-दो दफे माँ और पापा, दोनों से रश्मि की बात हो ही जाती थी। जब बात हाल-चाल तक कि रहती, तब तक तो ठीक था पर जब माँ के सवाल ऑफिस, वहाँ के लोग, दूसरे दोस्त और अन्य निजी मामलों पर पहुँचती तो रश्मि थोड़ी खीज जाती थी। उसे लगने लगता जैसे कोई उसके पंखों को पकड़ कर नीचे गिराने की कोशिश कर रहा है परन्तु ऐसा था नहीं। रश्मि केवल एक बेटी होने की हैसियत से ही सोचती थी। सच ही है, जब तक आप खुद माँ या बाप नहीं बन जाते, आप अपने माँ-बाप का आपके प्रति व्यवहार को समझ नहीं सकते। इसी खीज की वजह से कई बार वह बहाना बना कर फ़ोन काट देती।

ये सिलसिला यूँ ही चलता रहा और रिश्ता यूँ ही संभालता रहा। पर एक दिन उसके पापा का फ़ोन आया और अगले ही दिन वो अपने घर पर थी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसा उसके साथ भी हो सकता है। पिछले रोज़ ही माँ घर पर काम करती हुई अचानक ज़मीन पर फिसली और दुर्भाग्यवश उनका सिर पास ही रखे टेबल की नोक से जा टकराया। विधि का विधान ही था कि एक चोट ने रश्मि से उसकी माँ को छीन लिया। यह घटना जितनी दर्दनाक थी, उतनी ही ये सभी के लिए भयावह थी। महीने भर तक घर में सन्नाटा पसरा रहा और फिर ज़िन्दगी के क्रूर नियम के हिसाब से सबने अपनी अपनी डोर फिर संभाल ली

रश्मि वापस अपने शहर आ गई और ऑफिस में व्यस्त हो गई पर हर रात वो अपने कमरे के कोने में बैठकर रोती थी। अपने फ़ोन को देखते हुए सोचती थी कि शायद यह सब एक अनचाहा सपना हो और उसके माँ के नाम से यह फ़ोन फिर से बज उठे। वो अपनी माँ से बात करना चाहती थी, उनकी आवाज़ सुनना चाहती थी, अपने ऑफिस, अपने दोस्तों, अपने बारे में, सब कुछ बताना चाहती थी। अब उसके पास कोई बहाना नहीं था पर समय का चक्र निर्दयी होता है। आज एक तरफ जब उसके पास बात न करने का बहाना नहीं था तो दूसरी और उसके फ़ोन के दूसरी ओर से अब कभी माँ की आवाज़ नहीं आती थी। वह ग्लानि और पश्चाताप में जीने को मजबूर थी। अब वो दिन ढल गए थे जब यह सब कितना आसान था।

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सफ़र वही, सोच नई

राजेश, यही नाम है उसका। वैसे तो कोई भी नाम ले लीजिये, कहानी कुछ ऐसी ही रहेगी।

राजेश रोज़ मेट्रो में सफ़र करता है। वैसे देखें तो अंग्रेजी वाला suffer भी कहा जा सकता है। और सिर्फ राजेश ही क्यों, सिर्फ नाम बदल दीजिये और उसी की तरह कई और राजेश भी रोज़ मेट्रो में सफ़र करते हैं। कहते हैं कि इस देश में एक तो साधारण श्रेणी (General) का होना और दूसरा लड़का होना बहुत बड़ा गुनाह है। कम से कम पढ़ाई के क्षेत्र में। पर जन-परिवहन में किसी भी श्रेणी का नौजवान लड़का होना सबसे बड़ा गुनाह-ए-तारीफ़ है।

हर किसी दिन की तरह वो भी दिन था। राजेश ऑफिस से लौट रहा था और किस्मत को दाद देनी होगी कि उसे आज बैठने के लिए सीट मिल गई जो कि ना ही महिलाओं के लिए और ना ही विकलांगों और वृद्धों के लिए आरक्षित थी। मन में तसल्ली लिए और कानों में टुन्नी (earphones) घुसाए वो आज इस सफ़र का आनंद उठा रहा था कई दिनों बाद। पास वाली महिलाओं के लिए आरक्षित सीट पर एक नौजवान लड़की बैठी थी, उससे शायद कुछ साल छोटी होगी।

चंद स्टेशन निकले होंगे कि अचानक राजेश के सामने एक वृद्ध महिला आ कर खड़ी हो गई जो कि देखने से गंभीर और अच्छे घर की लग रही थी। कुछ लम्हों के लिए तो किसी ने कुछ नहीं किया पर राजेश को लगा कि अब बगल वाली लड़की उठ कर उन्हें सीट देगी पर यहाँ किस्मत को खुजली हो आई और ये हो न पाया।

इसी बीच वृद्धा की नज़र राजेश पर गड़ गई और उसने झट बोल दिया, “तुम उठ जाओ, मुझे बैठने दो।” अगर और कोई दिन होता तो शायद कोई बात नहीं थी पर आज तो उसके बगल में एक हमउम्र लड़की बैठी थी तो फिर वो ही क्यों उठे? ऐसा उसने सोचा और तपाक से बगल वाली मोहतरमा से कहा, “आप उनको बैठने दीजिये। ये महिलाओं के लिए आरक्षित भी है और आप खड़ी हो कर यात्रा कर सकती हैं।” एक बार को तो जैसे लड़की और वृद्धा, दोनों को सांप सूंघ गया। शायद दोनों ने ऐसी “असामाजिक” जवाब के बारे में सोचा ही नहीं था।

इसके बाद वृद्धा ही उससे बहस करने लगी, “लड़की क्यों उठे, तुम्हें उठना चाहिए।” पर राजेश आज अड़ गया बोला, “अगर लड़का-लड़की को एक समझा जाता है तो मैं ही क्यों उठूँ? केवल मुझे ही इसके लिए मजबूर क्यों किया जाए? क्या मैं दिन भर काम करके नहीं आया हूँ जो नहीं थका होऊँगा? अगर हम आज Gender Equality की बात कर रहे हैं तो फिर आज मैं नहीं उठूँगा, आप इस लड़की से अपनी सीट देने के लिए कहिये”

आसपास वाले यात्री एक बार को तो चौंके पर फिर राजेश की बातों की ओर झुकने लगे। लड़की ने वृद्धा के बिना बोले ही सीट खाली कर दी।

स्टेशन बदल रहे थे पर साथ ही साथ लोगों की सोच भी।

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सुनो, अरे सुनो!

साभार: गूगल

राहुल मेरी-आपकी तरह एक आम आदमी, नौकरी करता है, घर आता है, घर चलाता है और फिर अगले दिन शुरू हो जाता है. अपने पितृगाँव से दूर है पर घर पर सब खुश हैं कि लड़का अपना अच्छा ओढ़-बिछा रहा है और घर की गाड़ी चला रहा है. अभी राहुल की शादी नहीं हुई है पर कार्य प्रगति पर है.

हमारी ही तरह राहुल भी सोशल मीडिया का भोगी है, आसक्त है. जो करता है, वहाँ बकता है. लोगों को लगता है कितना बोलता है, हर बात यहाँ खोलता है. कभी फेसबुक तो कभी ट्विटर तो कभी व्हाट्सऐप. हर जगह उसकी मौजूदगी है. करोड़ों-अरबों लोगों की तरह ही वो भी दिन भर बकर बकर करता रहता है.

ऐसा लगता है जैसे सुनने वाले तो बचे ही नहीं, सब बोलने वाले और इज़हार करने वाले ही इस दुनिया में रह गए हैं. अगर बोलना कला है तो सुनना उससे भी बड़ी कला है पर आज की अगड़म-बगड़म ज़िन्दगी में लोगों को विश्वास ही नहीं होता है कि सुनना भी एक कला है क्योंकि उन्होंने तो सिर्फ बकना ही सीखा है.

इस आसक्ति का शिकार हुए राहुल को यह पता ही नहीं चला कि जो वो सोशल मीडिया और फ़ोन पर तरह तरह के ऐप्स से दुनिया से जुड़ा हुआ है, दरअसल वह इस सिलसिले में खुद से ही कट चुका है. नौकरी करने, घर चलाने और सोशल मीडिया के भ्रमित दिखावे की बराबरी करने के चक्कर में कब वह अन्दर से टूट गया यह उसे एक दिन पता चला जब वह अपने कमरे में अपने लैपटॉप के सामने बैठा था. अचानक उसे अपने भविष्य की चिंता होने लगी कि वो करना क्या चाहता है, कर क्या रहा है और भी न जाने कैसे-कैसे उटपटांग सवाल.

ऐसा पहली बार हुआ था जब वो खुद का विश्लेषण कर रहा था और करते करते बेहद डर गया था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किससे बात करे, क्योंकि यहाँ सुनने वाला तो कोई है ही नहीं, सिर्फ बोलने वाले लोग ही बचे हैं. वह अपने फेसबुक की लिस्ट खंगालता है, ट्विटर पर अनजान दोस्तों के फेहरिस्त जांचता है और फ़ोन पे अनगिनत नंबरों को टटोलता है पर एक ऐसा इंसान नहीं ढूंढ पाता जो सिर्फ और सिर्फ उसे सुने, कुछ कहे नहीं, अपनी सलाह न थोपे. उसका मन उदास हो जाता है और वह सब कुछ बंद करके सोने की नाकाम कोशिश करता है.

ऐसा कई दिन चलता है. कई चीज़ें आप अपने घरवालों से नहीं अपितु अपने दोस्तों के साथ साझा करते हैं पर राहुल तो इस वैकल्पिक जद्दोजहद में एक दोस्त भी न बना पाया था. सब पानी के बुलबुले की तरह इधर उधर उड़ते दिखे और अंततः मानसिक तनाव, नौकरी के दबाव और ज़िन्दगी से बिखराव ने राहुल के दिमाग को चरमरा दिया और उसे उदासी (डिप्रेशन) के गड्ढे में गिरा दिया.

एक हँसता, बोलता, खिलखिलाता नौजवान भरी जवानी में उदासी का शिकार हुआ क्योंकि उसको सलाह देने वाले तो बहुत थे पर सुनने वाला एक भी नहीं.

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सस्ती जान

राकेश और मोहित, पक्के दोस्त. स्कूल में ११वीं में एक साथ थे. वैसे तो दोनों मध्यमवर्गीय परिवार से थे पर युवावस्था में आ कर सभी शौकीन हो जाते हैं क्योंकि ये समय ही होता है बेपरवाह उड़ने का.

दोनों को चौपाटी में जा कर खाने का बड़ा शौक था. शहर के एक व्यस्त बाजार में सड़क किनारे खाने का वो आनंद किसे नहीं होगा? पर चूँकि यह जगह उनके घर से दूर था, तो कभी-कभार बस पकड़ के पहुँच जाते था. चंद महीनों पहले मोहित के पापा ने घर के लिए स्कूटी खरीद ली थी और मोहित के लिए ‘लर्नर्स लाइसेंस’ भी बनवा दिया था. गाहे-बगाहे दोनों इसी स्कूटी पर मस्ती मारने निकल पड़ते पर घर से यह सख्त हिदायत थी कि दोनों को हेलमेट पहनना पड़ेगा. शहर में भी यही नियम था.

घर से निकलते वक़्त तो दोनों हेलमेट पहने हुए निकलते पर अगले ही नुक्कड़ पर पीछे बैठा यात्री अपना हेलमेट अपने हाथों में टांग लेता. फिर तो बस उन चौराहों पर जहाँ पुलिस खड़ी होती, वहीँ पर हेलमेट सिर पर सजता था नहीं तो हाथ पर. कई महीनों तक ऐसा चलता रहा और अब तो यह आदत सी बन चुकी थी. वैसे भी हिंदुस्तान में जान जाने से ज़्यादा चालान कटने का डर लगता है.

बस काल को इसी एक दिन का इंतज़ार था. दोनों चौपाटी की ओर बढ़ चले थे और पुलिस चौराहा पार करते ही पीछे बैठे राकेश ने अपना हेलमेट सिर से उतारकर हाथों में टिका लिया था. सड़क के अगले कोने पर ही एक बदहवास कुत्ता न जाने कहाँ से उनके सामने आ गया और तीव्र गति में चल रही स्कूटी को मोहित संभाल न सका और कुत्ते से बचने के चक्कर में पास ही में चल रहे डिवाइडर पर स्कूटी दे मारी.

इसके बाद दोनों हवा में उछल के सड़क के उस पार और फिर मोहित को कुछ याद नहीं. शायद कई दिन बीत गए थे और आज जा कर अस्पताल में उसकी आँखें खुली. कमरे में इस वक़्त कोई नहीं था. बस एक अखबार पड़ा था जिसमें एक फोटो थी एक नौजवान की. वह गिरा पड़ा था सड़क पर और उसके हाथों में एक हेलमेट अटका हुआ था. उसके सिर से खून का तालाब सड़क पर बन चुका था. नीचे लिखा था:

“जान सिर में होती है, हाथों में नहीं” -ट्रैफिक पुलिस

साभार: गूगल

 

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हो रहा महिला सशक्तिकरण!

अनिता और पूनम पहली बार कॉलेज में ही मिली थी और समय के साथ बहुत ही गहरी दोस्त बन गयी थीं। चूँकि उनकी संकाय भी एक ही थी तो क्लास जाना, परीक्षा के लिए पढ़ना, असाइनमेंट पूरा करना, इत्यादि इत्यादि सब साथ में होता था।

जब इतनी देर साथ रहते थे तो कई सारी चर्चाएं भी दोनों के बीच होती जो कि लड़कों, रिश्तों, प्रोफेसर्स, घर, देश, इत्यादि के इर्द-गिर्द घूमता था। महिला दिवस के आसपास मार्किट में महिला सशक्तिकरण को लेकर बेहद गरम लू चली। अख़बार, टीवी, ब्लॉग, फेसबुक, हर जगह कोई न कोई अपने मन की भड़ास उढ़ेल रहा था।

चित्र: साभार गूगल बाबा

एक बार कॉलेज की छुट्टी होने के बाद दोनों घर को निकली तो रास्ते में अनिता ने कहा, “महिला सशक्तिकरण के नाम पर जो आरक्षण का ढकोसला सरकार ने किया है, वह हमें सशक्त नहीं बनाएगा।”
इसपर पूनम ने भी हामी भरते हुए कहा, “सही कह रही हो। हम लड़कियों को पुरुषों की तरफ से विशेष व्यवहार या सुविधाओं की ज़रूरत नहीं है। हम खुद में सक्षम हैं और यह हम हर क्षेत्र में करके भी दिखा रही हैं।”

दोनों में इसी तरह सरकार की नीतियों और महिलाओं को ख़ास सुविधाएं दे कर महिलाओं को और कमज़ोर करने की बात पर रास्ते भर वार्तालाप हुई और वो ऐसी व्यवस्था को कोसती रहीं।

फिर दोनों घर जाने के लिए मेट्रो में चढ़ीं और तुरंत ही महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर बैठे दो नौजवानों को उठने को कहा और खुद वहाँ बैठकर महिला सशक्तिकरण पर विचार को आगे बढ़ाने लगीं।


जब तक ऐसी पढ़ी-लिखी महिलाएं इस सशक्तिकरण का सही अर्थ ढूंढती हैं, तब तक मेरी आवाज़ में एक गीत (राबता) सुनते चलिए यहाँ पर!

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माँ का आँचल

ऑडियो यहाँ सुनें:

प्रशांत एक सुशिक्षित और भद्र इंसान था। घर से दूर रहते ५-६ साल हो गए थे। अब नौकरी कर रहा था ३ सालों से। उससे पहले पढाई। दिल का बड़ा सख्त था। साल में २-३ बार ही घर आ पाता। नौकरी पेशा आदमी की सांस और आस दोनों उसके मालिक के हाथ में होती है। चंद रुपयों के लिए इंसान केवल दास बन कर रह जाता है।

छुट्टियों पर घर आया। माँ ने आते ही टोह लगा ली थी कि प्रशांत परेशान सा लग रहा है पर वक़्त को अपना काम करते दे रही थी, कुछ कहा-पूछा नहीं।

दूसरे दिन रात को प्रशांत की नींद उड़ गयी थी। उसके जज़्बात उसको तोड़ने को आतुर हो रहे थे। ज़िन्दगी भर की परेशानियां उसे सोने न दे रहीं थी। २ घंटे तक लेटे रहने के बाद भी जब नींद न आई तो उसके विचारों का बाँध टूट गया। वह उठा और जा कर माँ-पिताजी के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया।

माँ ने दरवाज़ा खोला तो वह माँ से लिपट कर रोने लगा। माँ घबराई नहीं, उसे पता था कि यह आज या कल तो होना ही था। सर सहलाते हुए उसे अपनी गोद में सुला लिया। किसी ने कुछ नहीं कहा पर माँ-बेटे का जो रिश्ता था, वह सब कुछ कह गया। प्रशांत ने माँ के आँचल में सारे गम उड़ेल दिए। सभी उत्तेजनाएं और परेशानियां कब उस ममत्व के महासागर में समा गए, इसका अंदाजा ही न लगा और वह गहरी नींद में सो गया।

सुबह देर से उठा। माँ घर का कामकाज कर रही थीं और वहीँ प्रशांत की दुनिया तो बिलकुल हलकी और आनंदमय हो चली थी।

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भौतिकवाद की दोस्ती

बात ज्यादा पुरानी नहीं है, या यूँ कहें की ज़हन में तरोताज़ा है।

कॉलेज का प्रथम वर्ष समाप्ति पर था। कई नए दोस्त बने थे, उनमें से धीरज भी एक था।
प्रथम सेमेस्टर की समाप्ति पर मैं घर से कीबोर्ड (पियानो) खरीद लाया था क्योंकि हारमोनियम के बाद अब यह सीखने की बड़ी इच्छा थी।

एक दफे मैं और धीरज क्लास से लौट रहे थे और तभी मैंने उसकी संगीत रूचि को देखते हुए बताया कि मैं घर से पियानो ले कर आया हूँ। वह बहुत खुश हुआ और उसके बारे में पूछने लगा। मैंने भी ख़ुशी-ख़ुशी उसे जानकारी दी कि कौन सी कंपनी का है और कौन सा मॉडल है, वगैरह-वगैरह।

मेरे रूम के पास पहुँचते हुए एक दूसरे को कल तक के लिए अलविदा कह रहे थे कि उसने कहा – “मुझे पता नहीं था कि तुम्हारे पास पियानो है, नहीं तो हम और भी बेहतर दोस्त हो सकते थे।” और इतना कह कर वह आगे हो लिया।

कुछ देर तक मैं स्तब्ध सा खड़ा रहा और सोचता रहा कि आजकल दोस्ती भौतिकता की गुलाम हो गयी है? किसी के पास किसी वस्तु का होना, न होना दोस्ती की डोर को मज़बूत या कमज़ोर करता है? ये हम किस दिशा की ओर जा रहे हैं?

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो वह वाक्या याद आ जाता है क्योंकि हर जगह आजकल भौतिकवाद ही दोस्ती का मापदंड हो चुका है। “भौतिकवाद की दोस्ती” इंसानों को दीमक की तरह खोखला करने में कामयाब नज़र आ रही है। कडुवा, पर सच।

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