भारत, मेरी सोच, मैं और जिंदगी..., समाज, India

सब धंधा है!

भईया, हमारी मानो तो सब बिजनस है, बिजनस। जहाँ आँख गड़ती है, कारोबार ही नज़र आता है। जहाँ चलता हूँ, लोग दर-मुलाई करते हुए पाए जाते हैं। घर-चौराहा-शहर-ऑफिस-संसद-सरहद, हर जगह धंधे की बू आती है। सबको जैसे मुनाफा कमाना है और उसी मुनाफे से स्वर्ग की टिकट का बिजनस करना है।

भौतिकवादिता का उड़ता तीर जिस तरह हमने कुबूला है, अपनी इस सुन्दर कृति को ऐसा देख कर… ख़ुदा भी आसमां से जब ज़मीं पर देखता होगा… क्या से क्या हो गया… ये क्या हुआ, कैसे हुआ, कब हुआ, क्यों हुआ। ऐसी हालत में ऊपरवाले का मदीरापान करना निषेध नहीं हो सकता। डूबते और दुखते को पहले मय का सहारा और तत्पश्चात् किसी दोस्त का सहारा।

आजकल तो अंतरजालीय संचार माध्यम (असमा) यानी कि सोशल मीडिया पर हर पोस्ट बिकाऊ लगता है। कौन किसके बारे में क्या पेल रहा है, अच्छा, बुरा, गलत, सही, जैसा भी हो, सब जैसे मुनाफ़े की कोई तरकीब और जुगत लगा रहे हों।

सब धन में मगन हैं
न चैन, न अमन है
खरीदना सबको गगन है
बस एक अविरल अगन है
सब धन में मगन हैं

अरे महाशय, जब सैनिकों की अर्थियों की भी लोग दूकान खोल लें तो फिर बाकी सबके बारे में कहना मक्कारी होगी। हर मौत पर हाय-तौबा मच रही है, लोग चिल्ला रहे हैं, खबरिया चीख रहे हैं, नेता-अभिनेता मौकों को तलाश रहे हैं और हम जैसे टिटपुन्जिये लेखक भी ऐसे विषयों पर लिख कर पैसे कमाने की होड़ में लगे हुए हैं। मैं ना कहता था, सब धंधा है? कोई दहेज ले कर शादी का धंधा कर रहा है तो कोई झूठी दहेज की साज़िश रचकर शादी का धंधा कर रहा है। सब वेश्यावृत्ति हो चली है जनाब, संभल जाईये।

अगर अभी तक आप इस लपेटे में नहीं आएँ हैं तो जल्द ही आएँगे और अगर बचना चाहते हैं तो सिर्फ एक ही उपाय है। संन्यास ले लीजिये। जी हाँ, सही पढ़ा। फकीर बन जाइए। घुस जाइए घने जंगलों की आड़ में जहाँ किसी कारोबारी को आपकी बू तक न आए नहीं तो वो वहाँ आ कर आपका भी धंधा बना डालेगा। दिक्कत यही है कि कम्मकल ये नए तरह के कारोबारियों को बिजनस करने के लिए अब दूकान खोलने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। ये छोटा-अदना सा जो चल-अचल, तार-रहित, तेज-बोंगा यंत्र आपके हाथ में है ना, बस यही सब हड़कंप की जड़ है।

ये बिजनस की बिमारी इसी यंत्र से फैलती है। चाहे सीने से लगाइए, चाहे लंगोट की जेब में रखिये, चाहे कानों पर चिपकाइए, ये बिमारी आपको कैसे भी जकड़ लेगी। और ऊपर से मशक्कत ये कि आज के ज़माने में अगर ये आपके पास न हो तो लोग बोलेंगे,
“क्यों, बाबा आदम के बाबा हो क्या?”
“क्यों, शेर शाह सूरी के चचा हो क्या?”
“क्यों, रानी एलिज़ाबेथ की दाई माँ हो क्या?”
जब ऐसे ताने सुनेंगे तो आदमी अपनी एक क्या, दोनों गुर्दे निलाम कर देगा पर इस यंत्र को फेफ़ड़ों से लगा लेगा, तभी जा कर उसके सीने को ठंडक मिलेगी।

देखिये, मैं हूँ लेखक, और मेरा काम है आपको आगाह करना। मेरा दायित्व कोई सामाजिक बदलाव का थोड़े ना है। उसका ठेका तो पहले से ही बुद्धिजीवियों ने हड़प रखा है। मैं तो बस लिखता हूँ और चुप हो जाता हूँ नहीं तो कल हमारी अर्थी की खबर भी छप जाएगी और आप सब मिलकर उसपर भी दूकान खोलकर बैठ जाएँगे और मन ही मन मेरी बात याद करेंगे, “मैं न कहता था, सब धंधा है!”

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रिसता यौवन

कब इस शांत-लहर-डर मन में उद्वेलित सुनामी जागेगी?
इस घुटते मरते यौवन में कब चिंगारी सी भागेगी?

काला अँधा सा ये जीवन, कैसा है यह बिका बिका?
क्यों हर चेहरा मुरझाया सा, क्यों है हर तन थका थका?
कब दौड़ेगी लाल लहू में, इक आग यूँ ही बैरागी सी?
स्फूर्ति-समर्पण-सम्मान सघन सी, निश्छल यूँ अनुरागी सी
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

आँखें देखो धँसी-फटी सी, अंगूठे कैसे शिथिल-कटे
कपड़े ज्यों रुपयों की माला, आत्म-कपड़े चीथड़े-फटे
कब तक बिकेगा ये स्वर्णिम यौवन, यूँ ही कौड़ी कटोरे में?
आँखें तेज़, ऊँचा सीना, कदम हो विजयी हिलोरे ले
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

क्यों है सोया-खोया जवां ये, आँखें खोले, खड़े हुए?
देखते नहीं सपने ये जिनमें, निद्रा-क्लांत हैं धरे हुए?
कब इन धूमिल आँखों का जल, लवण अपनी उड़ाएगा?
स्पष्ट निष्कलंक हो कर के फिर से, सच्चाई को पाएगा
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

कैसा है ये स्वार्थ जो इनमें, अपने में ही घिरे हुए
५ इंच टकटकी लगाए, अपनी धुन में परे हुए
ज़िन्दा है या लाश है इनकी, नब्ज़ें ऐसी शिथिल हुई
हकीकत की लहरा दे सिहरन, कहाँ है वो जादुई सुई?
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

भौतिकता में फूंकी जाती, देखो जवानी चमकती सी
बस पहन-ओढ़-खा-पी के कहते, ज़िन्दगी है बरसती सी
कब बिजली एक दहकती सी, इस भ्रांत स्वप्न को फूंकेगी?
फिर जल-बरस बेहया सी इनपर, यथार्थ धरा पर सुलगेगी
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

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दो दिन ज़िन्दगी के

याद है वो कहावत, “चार दिन की है ये ज़िन्दगी..“? याद तो होगा ही, पर मुझे लगता है कि समय आ गया है इस कहावत को बदलने का। अब क्या कहें, समय और समाज में जो बदलाव आये हैं उसमें तो ये बदली हुई पंक्तियाँ ही सटीक लग रही हैं “दो दिन ज़िन्दगी के..

कितनी आसान थी उस छोटे से शहर में अपने छोटे ख़्वाबों को चुनते, एक दूसरे से बुनते हुए वो साधारण सी ज़िन्दगी। आह! सरल, सुखी और समृद्ध सा अलसाया हुआ जीवन। मुझे याद नहीं आता कि कभी हम हफ्ते के उन दो दिनों का इतने बेसब्री से इंतज़ार करते हों जितना आज करते हैं। बड़े शहर में आ कर सपने तो बड़े हो गए पर समय? समय दिन-ब-दिन छोटा होता जा रहा है।

सुबह से शाम कब हो जाती है, AC के डब्बे में बैठकर पता ही नहीं चलता। मौसम को आखिरी बार बदलते हुए कब देखा था पता नहीं। अब तो सिर्फ सर्दी-जुखाम-बुखार से ही बदलते मौसम का अंदेशा होता है। 5 दिन कब हवा बन के नज़रों के सामने से गुज़र जाती है ये खबर कानों को भी नहीं मिलती। खबर बस यही गरम रहती है कि “भाई, Saturday-Sunday आ गया“! ऐसा लगता है मानो हम इन दो दिनों के सेवक बन गए हैं। 5 दिन किसी और की सेवा करते हैं और 2 दिन शनि-रवि की।

कैसी घिसती हुई सी ये ज़िन्दगी हो गई है जो
हर हफ्ते उन दो दिनों की मोहताज हो जाती है,
हर हफ्ते वही दो दिन जिसमें हम जीने की कोशिश करते रहते हैं,
वही दो दिन जब हम अपने आसपास एक छलावे भरा जाल बुनकर समझते हैं कि इसमें हम जी लेंगे,
वही दो दिन जब हम अपने परिवार के साथ कुछ वक़्त बिताने की कोशिश करते हैं!

पर सोमवार आते ही रटते वही हैं कि “यार ये दो दिन कब उड़ गए पता ही नहीं चला“। सवाल ये है कि क्या हम अपनी ज़िन्दगी को बस उड़ते हुए ही देख रहे हैं या असल में जी भी रहे हैं?

क्या ज़िन्दगी का मकसद बहुत पैसे कमाना और उन दो दिनों में उनको बेहिसाब खर्च कर देना ही है? सुबह 8 से शाम की 8 बजाकर अगली सुबह की उधेढ़बुन में ही मचलते रहना, क्या यही है वो ज़िन्दगी जिसकी आप तलाश कर रहे हैं? सवाल तो बहुत बड़ा है पर जवाब इससे भी बड़ा होगा और यह जवाब हमें खुद के गिरेबान में झांककर ही मिलेगा।

ज़िन्दगी आसान तो नहीं ही है पर कम से कम इसे उलझन तो न बनाएं। 2 दिन की छुट्टी मिलेगी या नहीं, यही परेशानी आपको महीनों पहले खाने लगती है। आज घर जल्दी चला जाऊँ क्या? इस बार सैलरी कितनी बढ़ेगी? मेरा बॉस मेरे बारे में क्या सोचता है? मैं ऐसा क्या करूँ की प्रमोशन जल्दी हो जाए? आज हम वो 5 दिन इन्हीं सब सवालों से घिरकर निकाल रहे हैं। किसी ने सच ही कहा है, हम सादी कमीज़ और काली पतलून डाले हुए, हैं तो बंधुआ मजदूर ही। गले में एक कॉर्पोरेट पट्टा डालकर हम बन जाते हैं पूर्णतः एक कॉर्पोरेट कुत्ता!

अपनी जीवन की भीतरी अभिलाषाओं का खून करके, उसका गला घोंटकर, अपने ज़मीर को दबाकर, अपने भीतर के बचपन को मारकर, सलीकेदार बने रहकर, समाज की सीमाओं में बंधकर, एक-एक दिन दासों की तरह काटकर, अपनी उँगलियों को कीबोर्ड पर घिसकर आखिर कब तक हम अपने आपको धोखा देते रहेंगे? कभी सोचा है कि आखिरी साँस लेते वक़्त ये धोखा हमें अपनी मौत से पहले ही मार देगा? कहावत तो बदलते रहेंगे। कभी चार दिन, तो कभी दो दिन की हो जाएगी ज़िन्दगी पर आपके पास तो सिर्फ एक ही ज़िन्दगी है। आप कब इसे हर दिन, हर पल, हर साँस के साथ जीने की ललकता दिखाएँगे? जवाब आप ही के अन्दर है। आने वाले Saturday-Sunday में खोजने की कोशिश कीजियेगा!

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खामोश राहें

कितनी खूबसूरत अनुभूति है ये खामोशी। दिन-ब-दिन बढ़ते शोरगुल और मचलती दुनिया में खामोशी अपना एक अलग स्थान रखती है। ये केवल मैं ही नहीं, दुनिया के तमाम लोग समझते होंगे जब अपने आसपास एक सन्नाटा पसर जाता है तो कैसे हम अपने में खो जाते हैं। जब कई दिनों तक ज़िन्दगी की उधेड़बुन में अपना जीवन बहुत तेज़ी से गुज़रता हुआ दिखता है तो क्या ऐसा नहीं लगता कि पहाड़ों पे चला जाए, कुछ दिन मौन-व्रत रखा जाए, ज़िन्दगी को धीमे किया जाए? क्या ऐसा नहीं लगता कि आप अपने घर के छत पर खड़े हो कर शहर के सन्नाटे को सुनने के बजाय देख सकें? इस बात से हम कितने बेखबर जीए जाते हैं कि खामोशी में कितनी शक्ति है, उसमें कितनी ऊर्जा है जो आपके जीवन में, आपके मन में चल रहे उथल-पुथल को, उस सारे बवंडर को, अपनी उसी ऊर्जा से तहस नहस कर देता है।

इस ठहराव के कई और पहलू भी हैं। एक गायक ने मंच पर चढ़ते ही कहा कि गाना ख़त्म होने के करीब १० सेकंड बाद ही ताली बजाएँ। उस १० सेकंड की खामोशी में ही उस गीत का असली रस छुपा है। तबसे मैं कोशिश करता हूँ कि हर गाने को संपूर्णतः सुनूँ और सच मानिए, अब गीतों को सुनने का मज़ा कुछ और ही हो गया है। पश्चिमी संगीत में ठहरावों का बहुत महत्त्व है पर भारतीय संगीत में मौन की उतनी ही महत्ता मैंने कम देखी है। परन्तु कई फ़िल्मी गीतों में हम गाने के बीच में खामोशी को महसूस करते हैं और उस ठहराव के बाद जब पहला सुर लगता है तो मानों दिल को उखाड़ते हुए निकल जाए। पुराने गीतों में ‘ऐ दिल-ए-नादान’ में आपने इसे महसूस किया होगा। इस खामोशी से अपने दिल को बिन्धवाने के लिए नए गीतों में एक उदाहरण ‘हुस्ना’ गीत का आता है (पियूष मिश्रा का लिखा/गाया) जो आपको ज़रूर सुनना चाहिए।

गीतों की बात के बाद खामोशी की हमारे निजी जीवन में भी ज़बरदस्त सार्थकता है। कई दफे किसी वार्तालाप में आपकी खामोशी की आपके शब्दों से ज्यादा ज़रूरत होती है। किसी के टूटे हुए दिल को चुप हो के सुनना, किसी के ज़िन्दगी के दर्द को अपनी चुप्पी की आगोश में लेना भी बहुत बड़ी कला है। कम-स-कम जो माहौल आजकल चल पड़ा है जहाँ बोलने वाले लोग ज्यादा और सुनने वाले श्रोता कम हो चले हैं, वहाँ तो यह कला और भी दुर्लभ हुआ जा रहा है। सोशल मीडिया ने हमें बोलना और, और बोलना ही सिखाया है। इसने हमारी श्रवण शक्ति को निर्बल बना दिया है। सबको अपनी बात, बस कहनी है। कोई सुनना नहीं चाहता और यही एक बड़ा कारण है कि हमारे आपसी रिश्तों में भी इसका बेहद नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। चाहे बात फेसबुक की करें, ट्विटर की करें या वाट्सऐप की, हर जगह लोग चौबीसों घंटे चटर-चटर करते पाए जाते हैं। इसी नकारात्मकता का एक बहुत ही बुरा परिणाम कुछ दिनों पहले सुनने को मिला जिसमें मेरे ही कॉलेज के एक लड़के ने ख़ुदकुशी कर ली क्योंकि वह निराशा और उदासी का शिकार हो गया था। सोशल मीडिया पे वह मज़ाकिया और खुश माना जाने वाला इंसान था पर असल ज़िन्दगी में कुछ और ही चल रहा था। शायद उसको सही में सुनने वाला एक भी इंसान न मिला। आज ये एक बहुत बड़ा सवाल है हम सबके सामने कि हम अपनी वाचालता और चुप्पी के बीच एक संतुलन कैसे बनाते हैं।

खामोशी हमारे लिए एक उपहार है जिसका मूल्य हम हर बीतते दिन के साथ भूलते जा रहे हैं। जब तक हम खामोशी से भी बात करना नहीं सीख जाएँगे तब तक हम परिपक्वता का केवल ढोंग कर सकते हैं। कितना सुकून मिलता है जब हम किसी फ़िल्म में नायक-नायिका को आँखों से अपने प्यार का इज़हार और बातें करते हुए देखते हैं। ये खामोशी ही है जो आपके रिश्तों की नींव को मज़बूत करती है। वैसे जाते-जाते बस एक ही बात कहना चाहूँगा। अगर ऊपर की सारी बात हवा हो गई हों तो याद करिये जब किसी दूसरे के घर पर रहते हुए किस खामोशी और चुप्पी से भी आपके माँ-बापू आपकी खबर ले लेते थे! 🙂 आह क्या दिन थे!
अब जब तक आप अपनी कोई टिप्पणी इस पोस्ट पर छोड़ कर जाते हैं, तब तक मैं अपने मन को मौन कर बचपन के किसी एक ऐसी घटना में खो लूँ।

वैसे मुझे बहुत देर से याद आया कि पिछले महीने (16/4) मुझे ब्लॉगिंग करते हुए 7 साल हो चुके हैं. आप सभी का आभार! 🙂

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रिश्तों की डोर

रश्मि उन लाखों लड़कियों की तरह है जो आज बेबाक, आज़ाद और खुले माहौल में रहना पसंद करती हैं और रहती भी हैं। पहले पढ़ाई के लिए कई साल घर से दूर रही और उसके बाद से नौकरी करते हुए भी घर से दूर रहती है। रश्मि के मम्मी-पापा ने कभी उसके निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं किया बस अपने सुझाव भर दिए. आज एक अच्छी कंपनी के एक अच्छी पोस्ट पर रश्मि आसीन है।

जैसा कि अक्सर होता है, माँ-बाप दूर रहने वाले अपने बच्चों से दिन में दो मिनट बात कर दिल को तसल्ली दे देते हैं, वैसा ही यहाँ भी था। हर रोज़ एक-दो दफे माँ और पापा, दोनों से रश्मि की बात हो ही जाती थी। जब बात हाल-चाल तक कि रहती, तब तक तो ठीक था पर जब माँ के सवाल ऑफिस, वहाँ के लोग, दूसरे दोस्त और अन्य निजी मामलों पर पहुँचती तो रश्मि थोड़ी खीज जाती थी। उसे लगने लगता जैसे कोई उसके पंखों को पकड़ कर नीचे गिराने की कोशिश कर रहा है परन्तु ऐसा था नहीं। रश्मि केवल एक बेटी होने की हैसियत से ही सोचती थी। सच ही है, जब तक आप खुद माँ या बाप नहीं बन जाते, आप अपने माँ-बाप का आपके प्रति व्यवहार को समझ नहीं सकते। इसी खीज की वजह से कई बार वह बहाना बना कर फ़ोन काट देती।

ये सिलसिला यूँ ही चलता रहा और रिश्ता यूँ ही संभालता रहा। पर एक दिन उसके पापा का फ़ोन आया और अगले ही दिन वो अपने घर पर थी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसा उसके साथ भी हो सकता है। पिछले रोज़ ही माँ घर पर काम करती हुई अचानक ज़मीन पर फिसली और दुर्भाग्यवश उनका सिर पास ही रखे टेबल की नोक से जा टकराया। विधि का विधान ही था कि एक चोट ने रश्मि से उसकी माँ को छीन लिया। यह घटना जितनी दर्दनाक थी, उतनी ही ये सभी के लिए भयावह थी। महीने भर तक घर में सन्नाटा पसरा रहा और फिर ज़िन्दगी के क्रूर नियम के हिसाब से सबने अपनी अपनी डोर फिर संभाल ली

रश्मि वापस अपने शहर आ गई और ऑफिस में व्यस्त हो गई पर हर रात वो अपने कमरे के कोने में बैठकर रोती थी। अपने फ़ोन को देखते हुए सोचती थी कि शायद यह सब एक अनचाहा सपना हो और उसके माँ के नाम से यह फ़ोन फिर से बज उठे। वो अपनी माँ से बात करना चाहती थी, उनकी आवाज़ सुनना चाहती थी, अपने ऑफिस, अपने दोस्तों, अपने बारे में, सब कुछ बताना चाहती थी। अब उसके पास कोई बहाना नहीं था पर समय का चक्र निर्दयी होता है। आज एक तरफ जब उसके पास बात न करने का बहाना नहीं था तो दूसरी और उसके फ़ोन के दूसरी ओर से अब कभी माँ की आवाज़ नहीं आती थी। वह ग्लानि और पश्चाताप में जीने को मजबूर थी। अब वो दिन ढल गए थे जब यह सब कितना आसान था।

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मैं और जिंदगी...

इमोसनल अत्याचार नहीं….प्यार…

शायद इस पोस्ट को कुछ दिन पहले ही आ जाना चाहिए था…अब इसका विषय ही कुछ ऐसा है…

नहीं नहीं, मैं गलत हूँ… इस पोस्ट का विषय ऐसा है जो हर मौसम, हर परिस्थिति और हर जगह पर चर्चा का विषय है..
और चूँकि मैं अपने बड़े भाई की शादी में व्यस्त था, इसलिए वो विशिष्ट दिन हाथ से फिसल गया जिस दिन शायद इसके पाठक ज्यादा होते 🙂 …वैलेंटाइन डे

पर चूँकि इस पोस्ट का विषय है प्या, तो मैं यह समझता हूँ कि अभी भी काफी लोगों को इस विषय पर और कुछ पढना है, जानना है… वैसे भी इस जालिम दुनिया में एक प्यार ही है जो अभी सबसे महंगा और सबसे ज्यादा मांग में है.. कौन कहता है कि केवल पेट्रोल और गैस के ही दाम बढ़े हैं… साहब प्यार करके देखिये तो सही, तब पता चलेगा महंगाई किस चिड़िया का नाम है… ऐसा मैं नहीं कहता हूँ… मेरा दोस्त है जो इस मंजुल प्यार की गिरफ्त में है… नाम तो मैं नहीं बता सकता पर एक मस्त वाकया हुआ कुछ दिनों पहले – हमने उससे पुछा कि वैलेंटाइन डे पर कितना खर्चा हुआ और उसका जवाब था कि उसके लिए तो हर दिन ही वैलेंटाइन डे है और हम हंसते-हंसते लोट-पोट हो गए .. और इस कारण वो दोस्त भी सुर्खियों में आया था…

खैर जो असली वाकया मैं आप सबको बताना चाहता हूँ वो मुझे क्लास १२ में सुनने को मिला था जब मैं कोटा में पढता था.. आज तो मैं कंप्यूटर पर गाने वगैरह सुन लेता हूँ और वैसे भी पिलानी में रेडियो स्टेशन है ही नहीं जो मैं रेडियो सुनूं.. तो कोटा में गाने सुनने का एक ही साधन था.. “विविध भारती“…. जिसका फिलहाल उपलब्ध ना होना काफी खलता है… तो ऐसा ही एक वैलेंटाइन डे विविध भारती भी मना रहा था और उस पर एक प्रोग्राम आया जिसके तहत पूरे भारतवर्ष में से कोई भी उन्हें कॉल करके वैलेंटाइन डे पर अपनी राय बता सकता था…

तभी एक कॉल आई जो की बिहार से किसी ४५-५० साल के सज्जन ने किया था.. उन्होंने ने कहाँ कि वो एक निजी बात सभी के साथ बांटना चाहते हैं… उन्होंने कहा कि आज वो शादी-शुदा हैं और उनके एक बेटा और एक बेटी है…

पर जब उनकी शादी नहीं हुई थी, तब उन्हें भी किसी से प्यार हुआ था… पर उनकी कभी हिम्मत नहीं हुई की वो उस लड़की को अपने दिल कि बात बता सकें और फिर कुछ दिनों बाद उस लड़की की कहीं शादी हो गयी और उसके बाद से आज तक वो उससे नहीं मिले हैं और ना ही उन्हें पता है कि वो अभी कहाँ पर है… पर इतना कुछ होने के बावजूद उस लड़की के बारे में वो यही सोचते हैं कि वो जहाँ पर भी हो, जिस किसी के साथ हो, बस खुश हो..बस |

उन्होंने यह भी बताया कि यह बात उनके परिवार में उन्होंने सभी को बताया है और किसी को कोई ऐतराज़ भी नहीं है… यह बात मुझे इतनी अच्छी लगी कि इस बार का पोस्ट उसी बात के नाम है…


प्यार वो नहीं होता है जो केवल एक लड़का-लड़की के बीच ही होता है..हम अपने माता-पिता, भाई-बहन और दोस्तों से भी प्यार करते हैं… बस फर्क यही है की उनके साथ प्यार बांटने के लिए किसी विशिष्ट दिन की रचना नहीं की गयी है
प्यार वो नहीं है जो आजकल की युवा समझती है… किसी के साथ दिन-भर रहना और रातों-रात फ़ोन पर बात करना…
प्यार वो नहीं है जब आप किसी को अपनी सारी बातें बताते हैं और उसकी पूरी बातें जानने के भी इच्छुक हैं… प्यार वो नहीं है जब आप उसे वैलेंटाइन डे पर किसी के साथ मनाते हैं…
प्यार वो नहीं है जब आपको कोई कीमती तोहफा देता हो और नीचे लिखता हो “With Lots Of Love“…

काफी लोगों को ये बातें फ़िल्मी लगती हैं.. पर एक सच यही है कि फिल्मों में कभी-कभी सच्चाई दिखा दी जाती है और मुझे ऐसा ही प्रतीत होता है की सच्चाई ये है….
प्यार तो आप किसी से बिना मिले भी कर सकते हैं…अब लडकियां आप बताइए कभी शाहरुख़ से मिली हैं ?? पर जब पूछेंगे तो कहेंगी – “Ya I simply love him” 🙂 .. खैर मजाक अलग, मैं यही मानता हूँ कि प्यार बढ़ने के लिए हमेशा साथ रहना ज़रूरी नहीं है…कभी कभी साथ रहकर भी प्यार वैसा ही रहता है..अब उन जनाब को ही देख लीजिये जो आज तक उस लड़की से नहीं मिले हैं और फिर भी उतना ही प्यार करते हैं जितना पहली बार देख कर हुआ था…
प्यार तो आप बिना किसी से कुछ कहे भी कर सकते हैं.. ऐसा बोलने कि कतई ज़रूरत नहीं है – “अगर मैं बात नहीं करूँगा/गी तो प्यार कैसे बढ़ेगा”..प्यार बोल-बोल कर नहीं चढ़ता है…वो तो बिन बोले ही बढ़ता रहता है…और सब कुछ कह जाता है…

कुछ लोगों को लग रहा होगा कि वो रेडियो वाले भाई-साहब कैसे हैं जिनकी शादी भी हो गयी है पर फिर भी वो किसी पराई औरत से प्यार करते हैं.. अब जनाब आप ही बताइए अगर उनके घर में इस बात को लेकर को परेशानी नहीं है तो हम जोर-ज़बरदस्ती ही अपने मकान में तोड़-फोड़ क्यों करें ?? मस्त रहिये और अपना प्यार बढाइये ना…
खैर आप जो भी सोचते हों इस लवेरिया के बारे में …(जैसा अपना बॉलीवुड कहता है) … टिपण्णी करके बताएं… और जब आप टिपण्णी लिख रहे हों तो यह गाना सुनते जाइये जो मैंने अपने भैया की शादी में गाया था… तब तक के लिए इमोनल प्यार करते रहिये और हौले-हौले प्यार बढ़ाते रहिये..
सायोनारा..आदाब…
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मैं और जिंदगी..., BITS और उसकी कुछ ख़ास बातें

संस्कृति ? या सिर्फ़ मजाक ?

अभी अभी ऑडी हो कर आ रहा हूँ…
बस यूँ ही चल पड़ा था… देखने कि कैसी तैयारियां चल रही हैं … कल संस्थापक दिवस पर होने वाले वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम की…
अब साहब यूँ समझ लीजिये की कुछ छुपे हुए कलाकार [कलाकार ?? जाने भी दो …] अपने आपको किसी तरह उस बिल से निकालने की जहोज्जत में जुटे हुए हैं…या फ़िर बाकी लोगों की मेहनत से.. जो भी कह लीजिये..सब बराबर है…

पता नहीं मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है ओर साथ ही साथ दुःख भी हो रहा है…

गुस्सा इसलिए कि जिस दिन इतने सारे प्रादेशिक संगठन अपनी अपनी संस्कृति की झलक दिखाने के लिए आमंत्रित किए जाते हैं वहां वो पता नहीं किस संस्कृति को दिखाना चाहते हैं…
शायद अब यह सब उनके लिए टाइम पास हो गया है…संस्कृति शब्द सिर्फ़ ओर सिर्फ़ एक मजाक बन कर रह गया है…
अगर आप अपने प्रदेश की झलक लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं तो आपके पास दो ही विकल्प हैं …
एक…या तो आप उसे करने में अपनी जान झोंक दें या ….
दो… उससे छेड़-छाड़ बिल्कुल ना करें |

पर जहाँ तक अभी के आखिरी रियाज़ की बात है, मुझे काफ़ी कम ही लोगों में इसके प्रति गंभीरता नज़र आई…
लोगों को यह बस एक मस्ती का जरिया ही ज़्यादा लग रहा था…
लोग बस स्टेज पर चढ़ने के इच्छुक हैं लेकिन शायद उन्हें यह नहीं पता की इस स्टेज पर चढ़ने के लिए जो सही में मेहनत करते हैं उन्हें इसकी गरिमा के बारे में पता है..वो इसकी इज्ज़त करना जानते हैं… उन्हें पता है की जब आप इस मंच पर होते हैं तो वो समय हँसी मज़ाक का नहीं होता है… पर आपकी सच्ची मेहनत को सही ढंग से प्रस्तुत करने का है… यह मैं इसलिए कह पा रहा हूँ क्योंकि मैंने इस मंच पर चढ़ने के लिए वाकई मेहनत की है ओर लोगों को तत्परता से मेहनत करते हुए देखा भी है…
बड़े शर्म की बात है कि कुछ आलसी लोगों के कारण कुछ वाकई में मेहनत करने वालों को भी दो गालियाँ खानी पड़ती हैं… कहते हैं ना – “गेहूं के साथ घुन भी पिसता है”

ओर जब मैं कुछ ऐसे लोगों का इन सब चीज़ों के प्रति विपरीत रुझान देखता हूँ तो गुस्सा इतना आता है मानो यह चाह रहा हूँ की अभी इनको इस उच्च मंच से विहीन कर दूँ… उनको उस आलस का एहसास तभी होता है जब लोग उनके ख़िलाफ़ नारेबाजी करते हैं.. साहब जब आप मेहनत करना ही नहीं चाहते हैं तो तालियाँ कहाँ से बटोरेंगे ??

जिस तरह से कुछ प्रादेशिक संगठन अपनी संस्कृति को प्रस्तुत कर रहे थे [या कल करने वाले हैं] उसे देख कर बड़ा दुःख हुआ की कल ये अपने से छोटों को ये दिखाएंगे अपनी संस्कृति के बारे में ?? ….. या फ़िर अपने बुजुर्गों को ये तसल्ली देंगे की हमारे हाथों में यह सुरक्षित है ?? ऐसा लग रहा था जैसे कुछ कंजर मंच पर चढ़कर नाटक कर रहे हैं…

दुःख इस बात का भी है कि इस बार भी [पिछले साल भी किसी कारणवश यह सम्भव नहीं हो पाया था] मैं यहाँ पर अपनी प्रस्तुति नहीं दे पाऊंगा… पर ठीक है.. हर जगह फूल तो नहीं मिलेंगे ना ? कहीं कांटें ही सही….
वैसे आप मेरा यह गाना यहाँ से डाउनलोड करके सुन सकते है… आशा करता हूँ आपको अच्छा लगेगा…

कल मैं देख कर आता हूँ .. लोग कितनी गंभीरता से अपनी संस्कृति का बिगुल बजाते हैं…
अगर सम्भव हुआ तो ज़रूर बताऊंगा… मैंने तालियाँ बजाई या गालियाँ..
तब तक के लिए नमस्कार….
जय बिट्स !!!

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