भारत, मेरी कविताएँ, मेरी सोच, मैं और जिंदगी..., युवा, समाज, India

रिसता यौवन

कब इस शांत-लहर-डर मन में उद्वेलित सुनामी जागेगी?
इस घुटते मरते यौवन में कब चिंगारी सी भागेगी?

काला अँधा सा ये जीवन, कैसा है यह बिका बिका?
क्यों हर चेहरा मुरझाया सा, क्यों है हर तन थका थका?
कब दौड़ेगी लाल लहू में, इक आग यूँ ही बैरागी सी?
स्फूर्ति-समर्पण-सम्मान सघन सी, निश्छल यूँ अनुरागी सी
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

आँखें देखो धँसी-फटी सी, अंगूठे कैसे शिथिल-कटे
कपड़े ज्यों रुपयों की माला, आत्म-कपड़े चीथड़े-फटे
कब तक बिकेगा ये स्वर्णिम यौवन, यूँ ही कौड़ी कटोरे में?
आँखें तेज़, ऊँचा सीना, कदम हो विजयी हिलोरे ले
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

क्यों है सोया-खोया जवां ये, आँखें खोले, खड़े हुए?
देखते नहीं सपने ये जिनमें, निद्रा-क्लांत हैं धरे हुए?
कब इन धूमिल आँखों का जल, लवण अपनी उड़ाएगा?
स्पष्ट निष्कलंक हो कर के फिर से, सच्चाई को पाएगा
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

कैसा है ये स्वार्थ जो इनमें, अपने में ही घिरे हुए
५ इंच टकटकी लगाए, अपनी धुन में परे हुए
ज़िन्दा है या लाश है इनकी, नब्ज़ें ऐसी शिथिल हुई
हकीकत की लहरा दे सिहरन, कहाँ है वो जादुई सुई?
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

भौतिकता में फूंकी जाती, देखो जवानी चमकती सी
बस पहन-ओढ़-खा-पी के कहते, ज़िन्दगी है बरसती सी
कब बिजली एक दहकती सी, इस भ्रांत स्वप्न को फूंकेगी?
फिर जल-बरस बेहया सी इनपर, यथार्थ धरा पर सुलगेगी
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

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भारत, मेरी कविताएँ, मेरी सोच, युवा, समाज, India, Recording, Young

मेरा वोट, मेरा देश

वैसे तो ४ राज्यों में चुनाव हो गए हैं पर अभी लोक सभा चुनाव जैसा शेर आने को तैयार हो रहा है तो यह कृति तब के लिए भी उतना अर्थ रखेगी।
यह कविता एक प्रतियोगिता के तहत लिखी थी पर उसका परिणाम आया नहीं है सो अब ब्लॉग पर डाल रहा हूँ। आशा है कि आप भी एक जागरूक भारतीय कि तरह अपने हक यानी “वोट” का इस्तेमाल ज़रूर करेंगे।
माना कि हम में से कईयों के १-२ दिन की छुट्टी ले कर अपने अपने इलाके में जा कर वोट करना होगा पर देश के लिए ५ साल में १-२ दिन निकालना हमारा फ़र्ज़ है।
और ज्यादा नहीं कहूँगा, आप कविता पढ़ सकते हैं और स्व-संगीतबद्ध सुन भी सकते हैं
बताइयेगा कैसा लगा।

“दसवीं पास है लड़का” सुनकर, नाक-भौं सिकोड़ते हो
“इंजीनियर है लड़का” सुनकर, पूरे तुम अकड़ते हो
पर
“अंगूठा छाप है नेता” सुनकर
क्यों आती नहीं चेहरे पर सिकुड़न?
पांचवी फेल नेता को चुनकर
भी क्यों है ये तुममें अकड़न?
जो पढ़ नहीं सकता “क ख ग़ घ”
क्या गढ़ पाएगा वह इतिहास?
चुनो पढ़े-लिखे सच्चों को
तभी होगा देश का विकास!

“वो है बलात्कारी” सुनकर, थूकते नहीं तुम थकते हो
“वो है व्यभिचारी” सुनकर, बंद दरवाज़े करते हो
पर
बलात्कार करता नेता तो
थूक को क्यों पी लेते हो?
अनाचारी नेता को घर में
क्यों तुम घुसने देते हो?
दामिनियों की लूटता इज्ज़त
क्या कर पाएगा उनकी रक्षा?
चुनो सदाचारी नेता को
तभी मिलेगी हमें सुरक्षा!

“एक गुंडा पकड़ा चौराहा पर”, सुनके हाथ गरमते हो
“एक चोर पकड़ा पब्लिक में”, तब तो खूब गरजते हो
पर
जब जीते चुनाव एक गुंडा
तब तुम क्यों नरमते हो?
जब चोर बनता है साहूकार
तब क्यों नहीं तुम गरजते हो?
जो लूटता है अपने लोगों को
क्या जुट पाएगा देश के लिए?
चुनो साफ छवि नेता को
बदलने परिवेश के लिए!

चंद पैसे खरीदे इज्ज़त तुम्हारी, तब बातें बड़ी तुम करते हो
चंद सिक्के तोले ज़मीर तुम्हारी, तब ज्ञानी बड़े तुम बनते हो
पर
जब बिकता है परिवार वोटों में
तब बातों से क्यों छुपते हो?
जब नेता करता लोभ पर शासन
तब ज्ञान कुँए में ढकेलते हो?
खरीदता है वोट जो नेता
क्या देश को न बेच आएगा?
चुनो सशक्त, अभिमानी नेता
भ्रष्टाचार मिट्टी में मिलाएगा!


चुनो उसे जो भ्रष्ट दिलों में
कहर बन कर छाएगा
चुनो उसे जो तुममें, मुझेमें
सुरक्षा भाव फैलाएगा
चुनो उसे जो कल के युग में
शिक्षा समृद्धि लाएगा
चुने उसे जो गरीबों को भी
स्वाभिमानी बनाएगा
चुनो उसे जो लोगों की खातिर
तन-मन अपना लुटाएगा
चुनो उसे जो देश की खातिर
जीवन अपना बिताएगा!

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दिवाली, मेरी कविताएँ, हिन्दी, Diwali

इस दिवाली तो बस..

इस दिवाली एक छोटी सी कृति उन तमाम लोगों के लिए, उन तमाम लोगों की तरफ से, जो यह दिवाली मेरी ही तरह अपने घर से दूर रहेंगे। मेरा तो यह मानना है कि आज के इस भगदड़ ज़िन्दगी में जब भी आप अपने घर-परिवार-दोस्तों के साथ होते हैं, तभी दीवाली-होली-ईद-रमज़ान मनती है।
पर जनाब यादों का सैलाब तो हर किसी को बहा ले जाता है फिर आप सब भी अपने अपने सैलाबों में बहते रहिये। जहाँ भी हों, खूब हर्षोल्लास से दीवाली मनाएँ! हार्दिक शुभकामनाएं!

याद है मुझे वो दिवाली से पहले की हलचल
जब पूरा घर इधर का उधर हुआ रहता था
कोई झाड़ू, तो कोई हथोड़ा लिए लगा हुआ था
जब चाय की चुस्कियों का होता था अल्पविराम
और कमर टूटने के बाद का आराम
अब
अगले दफे आऊंगा घर दिवाली पर
तब दोहराएँगे यही काम
इस दिवाली तो बस “राम राम”

याद है मुझे वो शेरवानी जो पहनी थी पिछली दिवाली पर
दुरुस्त जो लगना था हमें इश की चौखट पर
क्या खूब सजाया था वो पूजन-मन
गाये थे हमने मन्त्र, आरती, भजन
इस दिवाली तो पजामे में ही बीतेगी शाम
अब
अगले दफे आऊंगा घर दिवाली पर
तब गाएंगे झूमेंगे हम सब तमाम
इस दिवाली तो बस “राम राम”

याद है मुझे वो खुशबू बेसन के सिकने की
कभी-कभी हम भी दो-चार हाथ चला दिया करते थे
और वो दाल के हलवे का स्वाद मुँह में आज भी जमा है
जिसे खूब जम के हम सब खाया करते थे
इस दिवाली तो बाजारू मिठाइयों से ही चलेगा काम
अब
अगले दफे आऊंगा दिवाली पर
तब डट के लुटाएंगे पकवानों पर जान
इस दिवाली तो बस “राम राम”

याद है मुझे वो बारूद की सुगंध आज भी
जब घंटों बजाते थे पटाखे चौक पर
कभी डर-डर के, कभी सर्र सर्र से
लगाते थे फुलझड़ी उस सुई सी नोक पर
इस दिवाली तो बस दर्शन का होगा काम
अब
अगले दफे आऊंगा दिवाली पर
तब लगाएंगे चिंगारी बेलगाम
इस दिवाली तो बस “राम राम”

याद है मुझे वो अगले दिन का मेल मिलाप

जब शहर का चक्कर लगाते थे दिन रात
कभी इस डगर, कभी उस के घर
हँसी ठहाके, सौ सौ बात
इस दिवाली तो खुद से मिलाएंगे तान
अब
अगले दफे आऊंगा दिवाली पर
तब गप्पों की खुलेगी खान
इस दिवाली तो बस “राम राम”
इस दिवाली तो बस “राम राम”
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दिल्ली, भारत, मेरी कविताएँ, संगीत, समाज, हिन्दी, Delhi, Dilli, Film, India

एक शहर देखा है मैंने – "दिल्ली"

सभी को बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि कुछ दिनों पहले एक 12 मिनट की फिल्म “दिल्ली” में संगीत देने का अवसर प्राप्त हुआ. आप में से कईयों को यह तो पता होगा कि मैं गाने का बहुत शौक़ीन हूँ (आपने मेरे गाने यहाँ सुने होंगे) और गाने के साथ-साथ मैं हारमोनियम/कीबोर्ड भी बजाता हूँ.

कॉलेज में कई गीत बनाए और गाए भी. इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इस फिल्म में भी संगीत दिया और पार्श्व में चल रहे कविता को भी मैंने ही लिखा है.

यह फिल्म दिल्ली के दूसरे पहलू को दर्शाने की कोशिश कर रहा है. एक पहलू तो वह जिसने दिल्ली को पिछले कुछ सालों में बहुत ही नकारात्मक दृष्टि प्रदान की है. इस फिल्म के ज़रिये हम दिल्ली में बदलाव की बात कर रहे हैं. बदलाव जो सड़कों पर उतरने से नहीं आता वरन खुद के भीतर से ही आता है. आम लोगों के सड़कों पर उतरने से आम आदमी ही परेशान होता है. आज तक इतने प्रदर्शनों से ना ही भ्रष्टाचार रुका और ना ही लड़कियों पर हो रहा अत्याचार.

इस फिल्म के जरिये यह गुहार लगायी गयी है कि बदलाव खुद से दूसरों तक फैलाओ और अपने घर को पहले स्वच्छ करो.

आशा है कि आपको यह प्रयास अच्छा लगेगा. विडियो देखें और अपनी राय ज़रूर दें.

पूरी कविता:
एक शहर देखा है मैंने
जहाँ सहर-ए-आफताब* से फिज़ा ज़र्द होती है (*सुबह की धूप)
जहाँ चाय के धुंए में फिक्रें सर्द होती हैं
जहाँ हर गली अपनी ही कहानी बिखेरता है
जहाँ हर इंसान अपनी किस्मत टटोलता है

एक शहर
जो गम और खुशी का मेल है
जो सही और गलत का खेल है
जो हर सोच को पनाह देता है
जो हर नज़र को निगाह देता है
जो हर मोड़ पे बदलता है
जो हर मौसम में मचलता है
जो कई मुकामों पे बहकता है
पर एक दूसरे से संभलता है
जो दर है हर मज़हब का
जो घर है शान-ओ-अज़मत* का (*शान और महानता)
जो यहाँ के लोगों की पहचान है
जो गैरों को मेहमान है

एक शहर
जो निशाना है जुर्म का
जिसको भय है खौफ का
पर
ये खेल है सिर्फ एक सोच का
एक सोच का जो इंसान को इंसान बनाती है
एक सोच का जो बदलाव लाती है
एक सोच जो साथ चलना सिखाती है
एक सोच जो निर्भय आवाज़ उठाती है
एक सोच जो खुद में विश्वास जगाती है
एक सोच जो शहर को घर बनाती है

एक शहर
जिसका आप बदल सकते हैं
अपनी सोच से, एक नयी सोच से
अब बदलाव दूर नहीं
अब दिल्ली दूर नहीं!

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भारत, मेरी कविताएँ, युवा, समाज, स्वतंत्रता दिवस, Independence Day, India, Young

मुझसे होगी शुरुआत!

यह गीत एक प्रतियोगिता के लिए लिखा और संगीतबद्ध किया था. इस स्वतंत्रता दिवस पर सबको उम्मीद है एक बदलाव की और वो बदलाव की शुरुआत खुद से होगी.

सब ओर है भ्रष्टाचार की बात
देश को जकड़े जिसके दांत
आओ अब सब कहें
मुझसे होगी शुरुआत!

लूटा है नेताओं ने देश तो क्या?
बदला है सच्चाई ने भेष तो क्या?
उठा यह नेकी का पुलिंदा तू
दहाड़ दे भ्रष्ट कानों में तू
अब हम भी लगा बैठे हैं घात
बोल! मुझसे होगी शुरुआत!

महंगाई की ये मार हम पर क्यों?
भ्रष्टों को खुली, आज़ाद हवा क्यों?
दृढ़ को निश्चित कर ले तू
डिगा दे हर गद्दार को तू
अब दे देंगे हर पापी को मात
बोल! मुझसे होगी शुरुआत

गूंगों को इन्साफ मिला है कब?
बिन बोले सुकूं से मरा है कब?
उँगलियों की मुट्ठी बना ले तू
राजाओं की गद्दी हिला दे तू
न रंग, न धर्म और न जात
बोल! मुझसे होगी शुरुआत
हाँ! मुझसे होगी शुरुआत!

इस संगीतमय कविता का विडियो भी आप देख सकते हैं (राजा पुंडलिक अंकल का धन्यवाद इसके लिए)

और केवल ऑडियो भी सुन सकते हैं!

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं!

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मेरी कविताएँ, मेरी सोच, संगीत

संगीत बन जाओ तुम!

कब तक इस नकली हवा की पनाह में घुटोगे तुम?
आओ, सरसराती हवा में सुरों को पकड़ो तुम
संगीत बन जाओ तुम!
कब तक ट्रैफिक की ची-पों में झल्लाओगे तुम?
आओ, उस सुदूर झील की लहरों को सुनो तुम
संगीत बन जाओ तुम!
कब तक अपनी साँसों को रुपयों में बेचोगे तुम?
आओ, आज़ाद साँसों की ख्वाहिश सुनो तुम
संगीत बन जाओ तुम!
कब तक कानाफूसी से कानों को भर्राओगे तुम?
आओ, चंद पल शान्ति की मुरली बजाओ तुम
संगीत बन जाओ तुम!
कब तक उस चीखते डब्बे को सहोगे तुम?
आओ, बच्चों की हंसी में उस लय को पकड़ो तुम
संगीत बन जाओ तुम!
कब तक इन सिक्कों की खनखनाहट तले दबोगे तुम?
आओ, घुँघरू की आहट को पहचानो तुम
संगीत बन जाओ तुम!
कब तक टूटे हुए दिल के टुकड़ों का मातम बनाओगे तुम?
आओ, उस एक दिल की धड़कन में समां लो तुम
संगीत बन जाओ तुम!
कब तक जिन्दगी की ज़ंजीर में घिसोगे तुम?
आओ, अपनी आज़ादी में गाओ तुम
संगीत बन जाओ तुम!
संगीत बन जाओ तुम!
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मेरी कविताएँ, मेरी सोच

अपने

सोचा करता था वह “अपने” लोगों के बारे में
वही जिनको वो कई रिश्तों से पहचानता था
माँ, पिता, भाई, बहन, चाचा, दोस्त, जिगरी दोस्त, चड्डी दोस्त..

“अपने”
यह शब्द भेदती थी उसे कभी..
क्या यह शब्द दुनिया का छलावा नहीं है?
इस शब्द ने कईयों की दुनिया नहीं उजाड़ी है?
पर
फ़िर
क्या इन्हीं “अपनों” ने उसकी ये ज़िंदगी हसीन नहीं बनाई है?
क्या वही ये “अपने” नहीं हैं
जो उसके सुख-दुःख में,
उसके गिरते क़दमों
और
कन्धों को सहारा देते रहे हैं?

पर आज उसे “भय” लग रहा है
आज उसके दिल से खून का कतरा सूखा जा रहा है
आँखों का पानी शरीर में ही कहीं सूख रहा है

क्यों..
आज न जाने क्या ख्याल आया
क्या ये “अपने” उसका साथ निभाएँगे?
तब
जब
पंचतत्व
उसके खून के हर कतरे को,
शरीर की हर बूँद को,
रूह के हर कण को,
अंगों की हर सांस को,
अपनी ओज में सुखाएगा
आखिरी आवाज़ लगाएगा?

उस दिन शायद उसे “अपने” छलावा लगेंगे
वो उसका साथ वहीँ छोड़ देंगे
क्या यह ज़िंदगी का छलावा नहीं है?
जो की फिल्म की चरमावस्था (क्लाईमैक्स) को
दुखांत (ऐन्टी-क्लाईमैक्स) कर देगा?
जिनके लिए पूरी ज़िंदगी जी है
बस वही नहीं मिलेंगे..

“अपनों” को “अपना” कहना
क्या उस दिन इस शब्द के खिलाफ नहीं हो जाएगा?
यह सोच कर वह आज घबरा रहा है
पर
फ़िर
जब तक सच्चाई का पता नहीं चलेगा
तब तक इस छलावे को जीना पड़ेगा
यह छलावा जिसे हम “अपने” कहते हैं
आज यही सच्चाई है..
आज यही ज़िंदगी है..

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