भारत, मेरी सोच, मैं और जिंदगी..., समाज, India

सब धंधा है!

भईया, हमारी मानो तो सब बिजनस है, बिजनस। जहाँ आँख गड़ती है, कारोबार ही नज़र आता है। जहाँ चलता हूँ, लोग दर-मुलाई करते हुए पाए जाते हैं। घर-चौराहा-शहर-ऑफिस-संसद-सरहद, हर जगह धंधे की बू आती है। सबको जैसे मुनाफा कमाना है और उसी मुनाफे से स्वर्ग की टिकट का बिजनस करना है।

भौतिकवादिता का उड़ता तीर जिस तरह हमने कुबूला है, अपनी इस सुन्दर कृति को ऐसा देख कर… ख़ुदा भी आसमां से जब ज़मीं पर देखता होगा… क्या से क्या हो गया… ये क्या हुआ, कैसे हुआ, कब हुआ, क्यों हुआ। ऐसी हालत में ऊपरवाले का मदीरापान करना निषेध नहीं हो सकता। डूबते और दुखते को पहले मय का सहारा और तत्पश्चात् किसी दोस्त का सहारा।

आजकल तो अंतरजालीय संचार माध्यम (असमा) यानी कि सोशल मीडिया पर हर पोस्ट बिकाऊ लगता है। कौन किसके बारे में क्या पेल रहा है, अच्छा, बुरा, गलत, सही, जैसा भी हो, सब जैसे मुनाफ़े की कोई तरकीब और जुगत लगा रहे हों।

सब धन में मगन हैं
न चैन, न अमन है
खरीदना सबको गगन है
बस एक अविरल अगन है
सब धन में मगन हैं

अरे महाशय, जब सैनिकों की अर्थियों की भी लोग दूकान खोल लें तो फिर बाकी सबके बारे में कहना मक्कारी होगी। हर मौत पर हाय-तौबा मच रही है, लोग चिल्ला रहे हैं, खबरिया चीख रहे हैं, नेता-अभिनेता मौकों को तलाश रहे हैं और हम जैसे टिटपुन्जिये लेखक भी ऐसे विषयों पर लिख कर पैसे कमाने की होड़ में लगे हुए हैं। मैं ना कहता था, सब धंधा है? कोई दहेज ले कर शादी का धंधा कर रहा है तो कोई झूठी दहेज की साज़िश रचकर शादी का धंधा कर रहा है। सब वेश्यावृत्ति हो चली है जनाब, संभल जाईये।

अगर अभी तक आप इस लपेटे में नहीं आएँ हैं तो जल्द ही आएँगे और अगर बचना चाहते हैं तो सिर्फ एक ही उपाय है। संन्यास ले लीजिये। जी हाँ, सही पढ़ा। फकीर बन जाइए। घुस जाइए घने जंगलों की आड़ में जहाँ किसी कारोबारी को आपकी बू तक न आए नहीं तो वो वहाँ आ कर आपका भी धंधा बना डालेगा। दिक्कत यही है कि कम्मकल ये नए तरह के कारोबारियों को बिजनस करने के लिए अब दूकान खोलने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। ये छोटा-अदना सा जो चल-अचल, तार-रहित, तेज-बोंगा यंत्र आपके हाथ में है ना, बस यही सब हड़कंप की जड़ है।

ये बिजनस की बिमारी इसी यंत्र से फैलती है। चाहे सीने से लगाइए, चाहे लंगोट की जेब में रखिये, चाहे कानों पर चिपकाइए, ये बिमारी आपको कैसे भी जकड़ लेगी। और ऊपर से मशक्कत ये कि आज के ज़माने में अगर ये आपके पास न हो तो लोग बोलेंगे,
“क्यों, बाबा आदम के बाबा हो क्या?”
“क्यों, शेर शाह सूरी के चचा हो क्या?”
“क्यों, रानी एलिज़ाबेथ की दाई माँ हो क्या?”
जब ऐसे ताने सुनेंगे तो आदमी अपनी एक क्या, दोनों गुर्दे निलाम कर देगा पर इस यंत्र को फेफ़ड़ों से लगा लेगा, तभी जा कर उसके सीने को ठंडक मिलेगी।

देखिये, मैं हूँ लेखक, और मेरा काम है आपको आगाह करना। मेरा दायित्व कोई सामाजिक बदलाव का थोड़े ना है। उसका ठेका तो पहले से ही बुद्धिजीवियों ने हड़प रखा है। मैं तो बस लिखता हूँ और चुप हो जाता हूँ नहीं तो कल हमारी अर्थी की खबर भी छप जाएगी और आप सब मिलकर उसपर भी दूकान खोलकर बैठ जाएँगे और मन ही मन मेरी बात याद करेंगे, “मैं न कहता था, सब धंधा है!”

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रिसता यौवन

कब इस शांत-लहर-डर मन में उद्वेलित सुनामी जागेगी?
इस घुटते मरते यौवन में कब चिंगारी सी भागेगी?

काला अँधा सा ये जीवन, कैसा है यह बिका बिका?
क्यों हर चेहरा मुरझाया सा, क्यों है हर तन थका थका?
कब दौड़ेगी लाल लहू में, इक आग यूँ ही बैरागी सी?
स्फूर्ति-समर्पण-सम्मान सघन सी, निश्छल यूँ अनुरागी सी
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

आँखें देखो धँसी-फटी सी, अंगूठे कैसे शिथिल-कटे
कपड़े ज्यों रुपयों की माला, आत्म-कपड़े चीथड़े-फटे
कब तक बिकेगा ये स्वर्णिम यौवन, यूँ ही कौड़ी कटोरे में?
आँखें तेज़, ऊँचा सीना, कदम हो विजयी हिलोरे ले
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

क्यों है सोया-खोया जवां ये, आँखें खोले, खड़े हुए?
देखते नहीं सपने ये जिनमें, निद्रा-क्लांत हैं धरे हुए?
कब इन धूमिल आँखों का जल, लवण अपनी उड़ाएगा?
स्पष्ट निष्कलंक हो कर के फिर से, सच्चाई को पाएगा
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

कैसा है ये स्वार्थ जो इनमें, अपने में ही घिरे हुए
५ इंच टकटकी लगाए, अपनी धुन में परे हुए
ज़िन्दा है या लाश है इनकी, नब्ज़ें ऐसी शिथिल हुई
हकीकत की लहरा दे सिहरन, कहाँ है वो जादुई सुई?
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

भौतिकता में फूंकी जाती, देखो जवानी चमकती सी
बस पहन-ओढ़-खा-पी के कहते, ज़िन्दगी है बरसती सी
कब बिजली एक दहकती सी, इस भ्रांत स्वप्न को फूंकेगी?
फिर जल-बरस बेहया सी इनपर, यथार्थ धरा पर सुलगेगी
कब इस शांत-लहर-डर मन में…

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बुरा तो मानो… होली है!

आजकल लोग बुरा नहीं मान रहे, क्या बात हो गयी है ऐसे? अभी कुछ दिन पहले तक तो लोग सुई गिरने पर भी हल्ला बोल मचा देते थे। अभी कल ही एक दोस्त मिला कई अरसे बाद। मैंने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई कि अब शादी हो गई है तो मिलता नहीं है, जोरू का गुलाम हो गया है, बीवी आते ही दोस्त बेकार हो गए? मुझे लगा कि वो अब आहत हो, तब आहत हो, पर मुए ने सिर तक न हिलाया, मुस्कुराता रहा। मुझे लगा था कि अब बोलेगा, या भड़केगा या बचाव करेगा पर नहीं, जनाब ने मुझे चारों खाने चित कर दिया था। मैं मायूस हो गया और उसके बजाय खुद ही आहत हो लिया। फिर मुझे लगा शायद शादी की डसन ने बेचारे को ज़्यादा उत्तेजित होने की कला से विरक्त कर दिया है तो मैं अपने रास्ते हो लिया।

आजकल फैशन में बुरा मान जाना बहुत चल रहा है इसलिए अगर कोई ऐसा नहीं मानता तो उसके खिलाफ तो मैं खुद ही बुरा मान जाता हूँ कि उसने बुरा क्यों नहीं माना? भई, समाज भी कुछ होता है! हमें बचपन से संस्कार मिला है कि समाज के साथ चलो, उसके जैसा करो, तब समाज आगे बढ़ेगा और तुम भी समाज की नज़रों में हवाओं पर उड़ोगे। बस इसलिए जो समाज में फैले फैशन के खिलाफ जाता है तो हम आहत हो जाते हैं। मैं तो कहता हूँ कि बच्चा परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो तो उसके शिक्षकों से ले कर, माँ-बाप, रिश्तेदार इत्यादियों को भी तुरंत आहत हो लेना चाहिए। इससे समाज का संतुलन बना रहेगा। नहीं तो क्या है कि बच्चा भी घबरा जाएगा कि लोग बुरा क्यों नहीं मान रहे हैं। हमें उस बच्चे की मानसिक हालत की हवा नहीं निकालनी है तो बुरा तो मानना ही होगा। आखिर अनुत्तीर्ण होना तो घोर अपराध है जिससे उसका जीवन व्यर्थ हो सकता है और समाज बर्बाद।

सुबह-शाम, दोपहर-रात, घर-ऑफिस, बस-ट्रेन, मालिक-नौकर, आदमी-जानवर, इत्यादि सभी मौकों और परिस्थितियों को हम आहतों के अनुकूल बना रहे हैं जो कि एक प्रशंसनीय कदम है। एक दोस्तनी को २ दिन तक मेसेज का जवाब नहीं दिया तो तीसरे दिन बुरा लगने का मेसेज आ गया और लिखा था कि वो २ दिन तक कुढ़ती रही थी और वो मुझसे बहुत आहत है क्योंकि मैंने उसके “कैसे हो?” का जवाब नहीं दिया था। मैंने उसे जवाब में लिखा, “मुझे तो तुम्हारा मेसेज ही नहीं मिला और तुम यूँ ही आहत हो ली? फ़ोकट में आहत हो कर कैसा लग रहा है? वैसे भी आजकल चलन में है। 😀” उसका जवाब तो अभी तक नहीं आया है। शायद कुछ दिन और कुढ़ेगी। कुढने दीजिये, अच्छा है समाज के लिए। इसी सिलसिले में ४-५ और लोगों को आहत करेगी और ये कड़ी को बढ़ाने में मदद करेगी।

और ये देखिये, बुरा मानने वाला तो सबसे बड़ा त्यौहार भी आ रहा है। मैं तो कह रहा हूँ कि होली की टैगलाइन को बदल कर “बुरा तो मानो होली है!” कर देना चाहिए क्योंकि बुरा मानने वालों की जमात अभी बहुमत में है। इससे सुनहरा मौका नहीं मिलेगा इस आहती सोच को बढ़ाने में। मार्केटिंग के ज़माने में टाइमिंग भी आखिर कोई चीज़ होती है। होली के दिन अगर कोई घर पर आ कर बाहर निकलने को कहे तो साफ़ कह दें कि इस बार वो होली नहीं खेलेंगे क्योंकि वो सरकार से आहत हैं कि उसने अपने वायदे पूरे नहीं किये या फिर कह दें कि इंद्र देव ने बिन मौसम “बरसो रे मेघा” कर दिया इसलिए वो नाक-भौं सिकोड़े बैठे हैं या फिर कह दें कि ओबामा ने भारत के खिलाफ जो बयान दिया है वो उनके गले नहीं उतरी है इसलिए इस साल वो अपने गले से भांग भी नहीं उतरने देंगे। कहने का मतलब है कि टुच्ची से टुच्ची बात के लिए भी अब हमको बुरा मान लेने की आदत डालनी पड़ेगी।

कोई कुछ ट्वीटता है तो ५० लोग हंगामा कर बैठते हैं, उन ५० लोगों के खिलाफ फिर १०० लोग हल्ला बोल देते हैं और फिर उन १०० के खिलाफ… आप समझ रहे हैं ना? बस यही जो कड़ी-दर-कड़ी, ट्वीट-दर-ट्वीट, पोस्ट-दर-पोस्ट, बयान-दर-बयान बुरा मानने का सिलसिला चल रहा है इसे हमें तब तक ख़त्म नहीं होने देना है जब तक हम ना ख़त्म हो लें। वैसे भी आजकल दिन भर का रोना हो गया है कि ज़िन्दगी बेकार हो गई है, नौकरी बेजान सी है, कोई आपको प्यार नहीं करता, आप ४ घंटे ट्रैफिक में बिताते हैं और भी न जाने क्या क्या। इसलिए इसका सबसे बढ़िया उपाय इन सबसे ऊपर उठने की बजाय आहत हो हो कर मर जाना अच्छा है। नहीं? अरे, अरे, आप तो बुरा मान गए। खैर मंशा तो मेरी यही ही थी।

देखिये अब मैं तो कहता हूँ कि आप ये पोस्ट पढ़ कर जबरदस्त ढंग से बुरा मान जाएँ कि इस पोस्ट से तो समाज में नकारात्मकता फैल रही है और इस पोस्ट को पढ़ कर कितनों की ज़िन्दगी तबाह हो जाएगी। और हाँ इस बुरा मानने के सिलसिले में ब्लॉग का लिंक भी फैला दीजियेगा। क्या है ना कि मार्केटिंग का ज़माना है और हमें फ़ोकट की मार्केटिंग बहुत पसंद है ठीक उन्हीं की तरह जो बे सिर-पैर की बयानबाजी से आपको आहत किये जा रहे हैं और आप उनकी फ्री फ़ोकट मार्केटिंग। अरे रे ये तो राज़ की बात खुल गई। वैसे कोई बात नहीं, आप तो हमारे मित्र हैं। मैं बुरा नहीं मानूँगा।

नोट: अभी अभी हमारी दोस्तनी का जवाब आ गया है। कह रही है कि उसने मुझे सोशल मीडिया पे हर जगह ब्लॉक कर दिया है। मुझे तो वैसे भी धेला फर्क नहीं पड़ रहा था। चलिए मगझमारी कम हुई एक 🙂
आपको होली की शुभकामनाएँ। खूब होली खेलिए-खिलाइए और लोगों को बुरा मनवाइये और ज़ोर से बोलिए, “बुरा तो मानो…”

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सफ़र वही, सोच नई

राजेश, यही नाम है उसका। वैसे तो कोई भी नाम ले लीजिये, कहानी कुछ ऐसी ही रहेगी।

राजेश रोज़ मेट्रो में सफ़र करता है। वैसे देखें तो अंग्रेजी वाला suffer भी कहा जा सकता है। और सिर्फ राजेश ही क्यों, सिर्फ नाम बदल दीजिये और उसी की तरह कई और राजेश भी रोज़ मेट्रो में सफ़र करते हैं। कहते हैं कि इस देश में एक तो साधारण श्रेणी (General) का होना और दूसरा लड़का होना बहुत बड़ा गुनाह है। कम से कम पढ़ाई के क्षेत्र में। पर जन-परिवहन में किसी भी श्रेणी का नौजवान लड़का होना सबसे बड़ा गुनाह-ए-तारीफ़ है।

हर किसी दिन की तरह वो भी दिन था। राजेश ऑफिस से लौट रहा था और किस्मत को दाद देनी होगी कि उसे आज बैठने के लिए सीट मिल गई जो कि ना ही महिलाओं के लिए और ना ही विकलांगों और वृद्धों के लिए आरक्षित थी। मन में तसल्ली लिए और कानों में टुन्नी (earphones) घुसाए वो आज इस सफ़र का आनंद उठा रहा था कई दिनों बाद। पास वाली महिलाओं के लिए आरक्षित सीट पर एक नौजवान लड़की बैठी थी, उससे शायद कुछ साल छोटी होगी।

चंद स्टेशन निकले होंगे कि अचानक राजेश के सामने एक वृद्ध महिला आ कर खड़ी हो गई जो कि देखने से गंभीर और अच्छे घर की लग रही थी। कुछ लम्हों के लिए तो किसी ने कुछ नहीं किया पर राजेश को लगा कि अब बगल वाली लड़की उठ कर उन्हें सीट देगी पर यहाँ किस्मत को खुजली हो आई और ये हो न पाया।

इसी बीच वृद्धा की नज़र राजेश पर गड़ गई और उसने झट बोल दिया, “तुम उठ जाओ, मुझे बैठने दो।” अगर और कोई दिन होता तो शायद कोई बात नहीं थी पर आज तो उसके बगल में एक हमउम्र लड़की बैठी थी तो फिर वो ही क्यों उठे? ऐसा उसने सोचा और तपाक से बगल वाली मोहतरमा से कहा, “आप उनको बैठने दीजिये। ये महिलाओं के लिए आरक्षित भी है और आप खड़ी हो कर यात्रा कर सकती हैं।” एक बार को तो जैसे लड़की और वृद्धा, दोनों को सांप सूंघ गया। शायद दोनों ने ऐसी “असामाजिक” जवाब के बारे में सोचा ही नहीं था।

इसके बाद वृद्धा ही उससे बहस करने लगी, “लड़की क्यों उठे, तुम्हें उठना चाहिए।” पर राजेश आज अड़ गया बोला, “अगर लड़का-लड़की को एक समझा जाता है तो मैं ही क्यों उठूँ? केवल मुझे ही इसके लिए मजबूर क्यों किया जाए? क्या मैं दिन भर काम करके नहीं आया हूँ जो नहीं थका होऊँगा? अगर हम आज Gender Equality की बात कर रहे हैं तो फिर आज मैं नहीं उठूँगा, आप इस लड़की से अपनी सीट देने के लिए कहिये”

आसपास वाले यात्री एक बार को तो चौंके पर फिर राजेश की बातों की ओर झुकने लगे। लड़की ने वृद्धा के बिना बोले ही सीट खाली कर दी।

स्टेशन बदल रहे थे पर साथ ही साथ लोगों की सोच भी।

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सुनो, अरे सुनो!

साभार: गूगल

राहुल मेरी-आपकी तरह एक आम आदमी, नौकरी करता है, घर आता है, घर चलाता है और फिर अगले दिन शुरू हो जाता है. अपने पितृगाँव से दूर है पर घर पर सब खुश हैं कि लड़का अपना अच्छा ओढ़-बिछा रहा है और घर की गाड़ी चला रहा है. अभी राहुल की शादी नहीं हुई है पर कार्य प्रगति पर है.

हमारी ही तरह राहुल भी सोशल मीडिया का भोगी है, आसक्त है. जो करता है, वहाँ बकता है. लोगों को लगता है कितना बोलता है, हर बात यहाँ खोलता है. कभी फेसबुक तो कभी ट्विटर तो कभी व्हाट्सऐप. हर जगह उसकी मौजूदगी है. करोड़ों-अरबों लोगों की तरह ही वो भी दिन भर बकर बकर करता रहता है.

ऐसा लगता है जैसे सुनने वाले तो बचे ही नहीं, सब बोलने वाले और इज़हार करने वाले ही इस दुनिया में रह गए हैं. अगर बोलना कला है तो सुनना उससे भी बड़ी कला है पर आज की अगड़म-बगड़म ज़िन्दगी में लोगों को विश्वास ही नहीं होता है कि सुनना भी एक कला है क्योंकि उन्होंने तो सिर्फ बकना ही सीखा है.

इस आसक्ति का शिकार हुए राहुल को यह पता ही नहीं चला कि जो वो सोशल मीडिया और फ़ोन पर तरह तरह के ऐप्स से दुनिया से जुड़ा हुआ है, दरअसल वह इस सिलसिले में खुद से ही कट चुका है. नौकरी करने, घर चलाने और सोशल मीडिया के भ्रमित दिखावे की बराबरी करने के चक्कर में कब वह अन्दर से टूट गया यह उसे एक दिन पता चला जब वह अपने कमरे में अपने लैपटॉप के सामने बैठा था. अचानक उसे अपने भविष्य की चिंता होने लगी कि वो करना क्या चाहता है, कर क्या रहा है और भी न जाने कैसे-कैसे उटपटांग सवाल.

ऐसा पहली बार हुआ था जब वो खुद का विश्लेषण कर रहा था और करते करते बेहद डर गया था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किससे बात करे, क्योंकि यहाँ सुनने वाला तो कोई है ही नहीं, सिर्फ बोलने वाले लोग ही बचे हैं. वह अपने फेसबुक की लिस्ट खंगालता है, ट्विटर पर अनजान दोस्तों के फेहरिस्त जांचता है और फ़ोन पे अनगिनत नंबरों को टटोलता है पर एक ऐसा इंसान नहीं ढूंढ पाता जो सिर्फ और सिर्फ उसे सुने, कुछ कहे नहीं, अपनी सलाह न थोपे. उसका मन उदास हो जाता है और वह सब कुछ बंद करके सोने की नाकाम कोशिश करता है.

ऐसा कई दिन चलता है. कई चीज़ें आप अपने घरवालों से नहीं अपितु अपने दोस्तों के साथ साझा करते हैं पर राहुल तो इस वैकल्पिक जद्दोजहद में एक दोस्त भी न बना पाया था. सब पानी के बुलबुले की तरह इधर उधर उड़ते दिखे और अंततः मानसिक तनाव, नौकरी के दबाव और ज़िन्दगी से बिखराव ने राहुल के दिमाग को चरमरा दिया और उसे उदासी (डिप्रेशन) के गड्ढे में गिरा दिया.

एक हँसता, बोलता, खिलखिलाता नौजवान भरी जवानी में उदासी का शिकार हुआ क्योंकि उसको सलाह देने वाले तो बहुत थे पर सुनने वाला एक भी नहीं.

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सस्ती जान

राकेश और मोहित, पक्के दोस्त. स्कूल में ११वीं में एक साथ थे. वैसे तो दोनों मध्यमवर्गीय परिवार से थे पर युवावस्था में आ कर सभी शौकीन हो जाते हैं क्योंकि ये समय ही होता है बेपरवाह उड़ने का.

दोनों को चौपाटी में जा कर खाने का बड़ा शौक था. शहर के एक व्यस्त बाजार में सड़क किनारे खाने का वो आनंद किसे नहीं होगा? पर चूँकि यह जगह उनके घर से दूर था, तो कभी-कभार बस पकड़ के पहुँच जाते था. चंद महीनों पहले मोहित के पापा ने घर के लिए स्कूटी खरीद ली थी और मोहित के लिए ‘लर्नर्स लाइसेंस’ भी बनवा दिया था. गाहे-बगाहे दोनों इसी स्कूटी पर मस्ती मारने निकल पड़ते पर घर से यह सख्त हिदायत थी कि दोनों को हेलमेट पहनना पड़ेगा. शहर में भी यही नियम था.

घर से निकलते वक़्त तो दोनों हेलमेट पहने हुए निकलते पर अगले ही नुक्कड़ पर पीछे बैठा यात्री अपना हेलमेट अपने हाथों में टांग लेता. फिर तो बस उन चौराहों पर जहाँ पुलिस खड़ी होती, वहीँ पर हेलमेट सिर पर सजता था नहीं तो हाथ पर. कई महीनों तक ऐसा चलता रहा और अब तो यह आदत सी बन चुकी थी. वैसे भी हिंदुस्तान में जान जाने से ज़्यादा चालान कटने का डर लगता है.

बस काल को इसी एक दिन का इंतज़ार था. दोनों चौपाटी की ओर बढ़ चले थे और पुलिस चौराहा पार करते ही पीछे बैठे राकेश ने अपना हेलमेट सिर से उतारकर हाथों में टिका लिया था. सड़क के अगले कोने पर ही एक बदहवास कुत्ता न जाने कहाँ से उनके सामने आ गया और तीव्र गति में चल रही स्कूटी को मोहित संभाल न सका और कुत्ते से बचने के चक्कर में पास ही में चल रहे डिवाइडर पर स्कूटी दे मारी.

इसके बाद दोनों हवा में उछल के सड़क के उस पार और फिर मोहित को कुछ याद नहीं. शायद कई दिन बीत गए थे और आज जा कर अस्पताल में उसकी आँखें खुली. कमरे में इस वक़्त कोई नहीं था. बस एक अखबार पड़ा था जिसमें एक फोटो थी एक नौजवान की. वह गिरा पड़ा था सड़क पर और उसके हाथों में एक हेलमेट अटका हुआ था. उसके सिर से खून का तालाब सड़क पर बन चुका था. नीचे लिखा था:

“जान सिर में होती है, हाथों में नहीं” -ट्रैफिक पुलिस

साभार: गूगल

 

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आँखों देखी (फिल्म)

ऐसा कब होता है जब आप एक भ्रामक अवस्था में धकेले जाते हों और वहीँ पर रह जाना चाहते हो? मेरे साथ तो ये तब होता है जब मैं वो फिल्में देखता हूँ जो असलियत को आपके चेहरे पर दे मारती है। ऐसी फिल्में जो सिर्फ परदे पर एक बनावट है पर हज़ारों जिंदगियों की सच्चाई। ऐसी फिल्में जिसे इस सच्चाई का डर नहीं कि वो पैसा कमाएगी कि नहीं पर उसे इस बात का गर्व है कि वो लोगों को धरातल पर रखेगी।

वैसी ही एक कला-फिल्म, “आँखों देखी” अभी देखी। ऐसा महसूस हो रहा था मानो कि मैं फिल्म के किरदारों का हिस्सा बन चुका हूँ। डेढ़ घंटे के लिए मेरी सच्चाई उस फिल्म की कहानी थी, उस फिल्म के लोग। ऐसी फिल्में देख कर मन रोमांचित हो उठता है और दिल चाहता है कि वह कहानी चलती रहे, निरंतर, अबाध, एकटक!

साभार: विकिपीडिया

मैं इस फिल्म की समीक्षा नहीं कर रहा हूँ, मैं तो सिर्फ यही समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि भौतिकवादी बाज़ार में सच को दिखाने वाले लोग भले ही कम हों पर जब भी वो सच आता है तो दिल को सुकूं सा मिलता है कि कला अभी भी सर्वोपरि है, उसे रुपयों में नहीं खरीदा जा सकता, वो बिकाऊ नहीं है। उन बनावटी फिल्मों से मन और भी उचट जाता है जब एक कला-केन्द्रित फिल्म मेरे आँखों के सामने से गुज़रती है।

पर एक सिद्धांत यह भी है कि मनुष्य का मन इतना भीरु और डरपोक है कि वो सच्चाई का सामना करने से डरता है और यही एक कारण है कि जब उसे फिल्मों के माध्यम से मिथ्या परोसा जाता है तो वह बड़ी रूचि से उसे चबाता है। ये फिल्में मिठाई की तरह है जिसे खाने पर एक सामान्य मनुष्य को लगता है कि बस इसका स्वाद सदा-सदा के लिए उसके जीभ पर बना रहे, पर ऐसा हो नहीं पाता। कला-केन्द्रित फिल्में करेले की तरह होती है क्योंकि वो हमें सच से सामना करवाती हैं और सच हमेशा कड़वा होता है। ऐसी फिल्मों में ना ही एक अजेय नायक होता है और ना ही सिर्फ प्रेम पाने को आतुर एक नायिका। मुझ जैसे, आप जैसे, किसी सामान्य इंसान को उठा लीजिये, इन फिल्मों के किरदार हमारी जिंदगियों से मिलते-जुलते से ही होते हैं। हम जिस ज़िन्दगी को जी रहे हैं ये कला केन्द्रित फिल्में उसी ज़िन्दगी की निरंतरता है और इसलिए यह करेला हमें उतना कड़वा नहीं लगता। वहीँ पर जो मिथक है, जो असत्य है, जो केवल हमारे मन का भ्रम है, ऐसी फिल्में हमें हमारी स्वाभाविक जिंदगियों से निकालकर एक कल्पित स्तर पर ला कर फेंक देती है जिससे वापस सच्चाई की धरा पर गिरना बेहद दर्द देने वाला होता है।

२ तरह के लोग होते हैं।
एक जो इस कल्पित दुनिया का हिस्सा बनकर जीना चाहता है। वह इस बात से घबराता है कि उसके सामने सत्य आ कर न खड़ा हो जाए। उसका सच दरअसल इस दुनिया के द्वारा परोसा हुआ झूठ है। उसे ज़्यादातर ऐसी ही फिल्में पसंद आएंगी जो उसके झूठ को और विस्तृत करेंगे, जो उसे उस झूठ में ही बांधे रखेंगी, जो उसे सत्य का सामना करने से बचाएंगी।

वहीँ दूसरी ओर ऐसे लोग होते हैं जो नित्य यह खोजते रहते हैं कि आखिर सत्य क्या है। उन्हें इन मिथक चलचित्रों से घनिष्ठ द्वेष रहता है। वो अपनी ज़िन्दगी में, अपने आसपास घट रही घटनाओं से, लोगों से, चलचित्रों से, किसी भी चीज़ में केवल सत्य को खोजने की कोशिश करते हैं और ऐसे ही लोगों के लिए “आँखों देखी”, “शिप ऑफ़ थिसियस” जैसी कला-केन्द्रित फिल्में बनाई जाती हैं। पहली श्रेणी के लोग ना ही ये फिल्में देख सकते हैं और ना ही इन्हें समझ सकते हैं।

वैसे भी भारत इतना बड़ा देश है और यहाँ के लोगों की मांगें इतनी विस्तृत हैं कि यहाँ सब चलता है। निरर्थक बातें वायरस की तरह फ़ैल जाती हैं और अर्थपूर्ण बातों को गला कोख में ही घुट जाता है। और चूँकि भारत की आबादी इतनी ज्यादा है, इसलिए यहाँ पर हर तरह की फिल्में भी चल जाती हैं।

खैर यह तो आप ही निश्चित करेंगे की आपके जीवन का सत्य क्या है। क्या आपका सत्य दुनिया द्वारा परोसा गया झूठ है या फिर आप अपने सत्य का निर्माण खुद, अपने दम पर करना चाहते हैं। फिल्में तो एक जरिया है ज़िन्दगी को अपने दृष्टिकोण से देखने का और मेरा कोण आपके कोण से अलग ही होगा क्योंकि आपकी “आँखों देखी” और मेरी “आँखों देखी” में बहुत फर्क हो सकता है 🙂

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