मेरी सोच, लघु कथा, समाज

माँ का आँचल

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प्रशांत एक सुशिक्षित और भद्र इंसान था। घर से दूर रहते ५-६ साल हो गए थे। अब नौकरी कर रहा था ३ सालों से। उससे पहले पढाई। दिल का बड़ा सख्त था। साल में २-३ बार ही घर आ पाता। नौकरी पेशा आदमी की सांस और आस दोनों उसके मालिक के हाथ में होती है। चंद रुपयों के लिए इंसान केवल दास बन कर रह जाता है।

छुट्टियों पर घर आया। माँ ने आते ही टोह लगा ली थी कि प्रशांत परेशान सा लग रहा है पर वक़्त को अपना काम करते दे रही थी, कुछ कहा-पूछा नहीं।

दूसरे दिन रात को प्रशांत की नींद उड़ गयी थी। उसके जज़्बात उसको तोड़ने को आतुर हो रहे थे। ज़िन्दगी भर की परेशानियां उसे सोने न दे रहीं थी। २ घंटे तक लेटे रहने के बाद भी जब नींद न आई तो उसके विचारों का बाँध टूट गया। वह उठा और जा कर माँ-पिताजी के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया।

माँ ने दरवाज़ा खोला तो वह माँ से लिपट कर रोने लगा। माँ घबराई नहीं, उसे पता था कि यह आज या कल तो होना ही था। सर सहलाते हुए उसे अपनी गोद में सुला लिया। किसी ने कुछ नहीं कहा पर माँ-बेटे का जो रिश्ता था, वह सब कुछ कह गया। प्रशांत ने माँ के आँचल में सारे गम उड़ेल दिए। सभी उत्तेजनाएं और परेशानियां कब उस ममत्व के महासागर में समा गए, इसका अंदाजा ही न लगा और वह गहरी नींद में सो गया।

सुबह देर से उठा। माँ घर का कामकाज कर रही थीं और वहीँ प्रशांत की दुनिया तो बिलकुल हलकी और आनंदमय हो चली थी।

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11 thoughts on “माँ का आँचल

  1. .भावात्मक अभिव्यक्ति ह्रदय को छू गयी आपकी कहानी आभार नवसंवत्सर की बहुत बहुत शुभकामनायें कौन मजबूत? कौन कमजोर ? .महिला ब्लोगर्स के लिए एक नयी सौगात आज ही जुड़ें WOMAN ABOUT MANजाने संविधान में कैसे है संपत्ति का अधिकार-1

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  2. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 20/04/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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