मेरी कविताएँ, मेरी सोच, India

आत्महत्या

 
वो निःशब्द, निस्तब्ध खड़ी रही,
हम हँसते रहे, फंदे कसते रहे,
वो निर्लज्ज कर्ज में डूबती रही,
हम उड़ती ख़बरों को उड़ाते रहे,
वो रोती रही, सिसकती रही,
हम बेजान खिलौनों से चहकते रहे,
वो चीखती रही, चिल्लाती रही,
हम अपने जश्न में उस आवाज़ को दबाते रहे,
वो डरती रही, बिकती रही,
हम खरीदारों का मान बढ़ाते रहे,

फिर एक दिन,
उसने आत्महत्या कर ली,
हम पन्ने बदलते रहे,
हम चैनल टटोलते रहे,
हम चाय पर बहस करते रहे,

ठंडी चाय पर मामला ठंडा हुआ,
हम ज़िन्दगी को उसी ज़िन्दगी की तरह जीते रहे,
आज फिर से,
वो निःशब्द, निस्तब्ध, निर्लज्ज खड़ी है…
सिसकती, दुबकी कहीं जड़ी है..
इंतज़ार उसे अब न्याय का नहीं है,
इंतज़ार है तो बस
आत्महत्या का..

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9 thoughts on “आत्महत्या

  1. अपने परिवेश में और देश में होते अन्याय के खिलाफ , आवाज़ बुलंद करनी चाहिए, हक के लिए लड़ना चाहिए।

    कैसे कह दूँ आत्महत्या का इंतज़ार है ? जाने कितने लोग जिंदगी की चंद साँसों के लिए तरस रहे हैं।

    इश्वर के दिए इस अनमोल जीवन का सम्मान करना चाहिए और भरपूर उपयोग करना चाहिए। खुद समृद्ध हो जाओ , तो दूसरों के लिए जियो । एक बार जब दूसरों के लिए जीने की आदत पड़ जाती है , तो ये उम्र छोटी लगने लगती है।

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  2. जीवन इतना सस्ता नहीं और न ही हिम्मत इतनी कमजोर .भाव अच्छे लगे पर इतनी निराशा दूसरों को भी निराश कर जाती है .

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