मेरी सोच, लघु कथा, समाज

दर्द-निवारक

छोटा सौरव जब चलना सीख रहा था तो कभी-कभी गिर पड़ता, माँ झट उसे गोद में लेकर उसके दर्द को गायब कर देती…

बचपन में जब चोट लगती थी तो सौरव भागा-भागा अपने माँ-बाप के पास आता था.. वो झट से उसका दर्द दूर कर देते…

कम नंबर आने पर जब सौरव उदास हो जाता तो उसके पिता उसे अच्छे से बैठ कर समझाते और उसका दुःख-दर्द झट ख़त्म हो जाता…

कॉलेज में जब किसी प्रोग्राम में सौरव हताश हो जाता तो उसके माँ-पिताजी उसका मनोबल बढ़ाते, उसकी हौसला-अफजाई करते और उसके दर्द को कम कर देते थे…

नौकरी शुरू की तो संसार की छोटी-मोटी सभी परेशानियां अपने माँ-पिताजी के समक्ष रखता और वो झट उसके दर्द को समझते और सही सलाह दे कर उसे दूर कर देते…

शादी होने के बाद जिम्मेवारी बढ़ गयी तो सौरव और परेशान रहने लगा… पिताजी कभी-कभी उसे बुलाते और उसे हर जिम्मेवारी को सही से निभाने की सलाह देकर उसका बोझ हल्का कर देते… उसका दर्द कम करते…

फिर एक दिन सौरव ने पत्नी की सुन ली और माँ-पिताजी को वृद्धाश्रम छोड़ आया.. वह खुद को आज़ाद महसूस करने लगा और खुश था…
पर एक दिन किस्मत ने पल्टी मारी… एक हादसे में उसने अपने बीवी-बच्चों को खो दिया.. 

उसपर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा…

वह भागा-भागा वृद्धाश्रम गया और अपने माँ-बाप को ले आया…

माँ-पिताजी ने निःसंकोच उसके दर्द को अपने में समा लिया और उसके दुःख को हल्का और कम कर दिया…

ज़िन्दगी यूँ ही चल रही है और सौरव को आज भी माँ-बाप सिर्फ और सिर्फ दर्द-निवारक ही लगते हैं…

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9 thoughts on “दर्द-निवारक

  1. बच्चे चाहे माँ बाप को कडएए दवा समझ कर बाहर फेंक दें मगर दवा तो हमेशा आदमी को स्वस्थ करती है। बहुत अच्छी लघु कथा। अच्छा लगा आपका ब्लाग। बहुत बहुत आशीर्वाद।

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  2. बहुत अच्छी बात कही है आपने अपनी कथा में…
    आपके ब्लॉग पर आ कर अच्छा लगा..इसकी साज सज्जा और कलेवर बहुत आकर्षक है…

    नीरज

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