मेरी सोच, लघु कथा, समाज

आपत्ति

ऋषि फ़ोन पर बात कर रहा था, अपनी गर्लफ्रेंड, प्रीती से..
प्रीती उसे कह रही थी कि वो सुबह जल्दी उठा करे और इसके फायदे और निशाचर होने के नुक्सान बता रही थी..
ऋषि पूरे तन्मयता के साथ सुन रहा था.. आधे घंटे तक सुना..

उनके इस रिश्ते के बारे में ऋषि की माँ को पता था और उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी.. वो प्रीती को पसंद करती थी…
शाम को ऋषि ने माँ को बताया कि प्रीती ने कहा है कि सुबह जल्दी उठूं, तो कल से वो जल्दी उठेगा…
माँ ने सोचा, अच्छा है.. कम से कम इस रिश्ते से इसमें कुछ सुधार तो हो रहा है.. खुश हुई..

कहा – अगर जल्दी उठने की अच्छी आदत डाल ही रहे हो तो स्मोकिंग भी छोड़ दो..
ऋषि एकदम से पलटा और कहा – “माँ, अब फिर से अपना लेक्चर शुरू मत करो..” और उठकर चला गया..

अब माँ को आपत्ति हो रही थी.. उन्हें आभास हो रहा था.. एक अंधकारमय भविष्य का..
ऋषि को अपना बेटा कहने में संकोच होने लगा था… पर कुछ कर न सकीं…

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3 thoughts on “आपत्ति

  1. रिश्तों के दायरे आदमी कैसे तय करता है………अपने अपनी लघुकथा से साबित कर दिखाया….अच्छी रचना ….बधाई वाह वाह ……………..

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  2. Rachna bahut achhi hai… is per ek vichaar aaya… —-

    Maa ko pehle koi aapatti nahi thi ki bete ki zindagi me koi achhi ladki aa gayi , aur wo bete ko sudhaar rahi hai. Per jab maa bete ko cigaratte chhodne ko kehti hai to beta jawab deta hai ki jab preeti kahegi to chhod dungaa… tab maa ko bahut bura lagta hai… unhe man ke kisi kone me ab aapatti hone lagti hai….

    Pata nahi man me jo aaya likh diya… ek kahani ke kitne pehlu ho sakte hain… !!! ye aapki rachna ke khulepan ka soundrya hai 🙂

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