मेरी कविताएँ

गिनती ज़िन्दगी की

बच्चे थे तो टॉफियाँ गिना करते थे,
थोड़े बड़े हुए तो दोस्त गिना करते थे,

स्कूल पहुंचे तो हाथों पर छड़ियाँ गिना करते थे,
कॉलेज आए तो मार्क्स गिना करते थे,

थोड़े और बड़े हुए तो गर्ल-फ्रेंड्स गिना करते थे,
नौकरी लगी तो तरक्कियां गिना करते थे,

शादी हुई तो बच्चे गिना करते थे,
फैक्ट्री लगाई तो रूपए गिना करते थे,

दादा बने तो पोते गिना करते थे,
आज जा रहे हैं इस दुनिया से

और साँसे गिनने की घड़ी आ गई है..
सोच रहा है क्या सिर्फ़ गिनते गिनते ही ज़िन्दगी निकाल दी ?
काश कभी इन उँगलियों पर उसका नाम भी गिना होता
जिसने यह गिनती बनाई है,

अब क्या फायदा ?
क्या फायदा अब सोचने से ?
साँसों का दामन तो छूट रहा है ….
और साथ-साथ दो आंसुओं की कीमत भी गिन रहा हैं…

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10 thoughts on “गिनती ज़िन्दगी की

  1. काश कभी इन उँगलियों पर उसका नाम भी गिना होताजिसने यह गिनती बनाई है,भाई बहुत खूब…सच कहा है आपने…कमाल की रचना….नीरज

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  2. Vineet Pandey se is blog ka link mila…pehle hi kavita mein mazaa aa gaya…ending zordaar thi jo is kavita ke liye zaroori tha…bahut achheshuruvaat ke lines mein thoda critical hone ki gunjaaish hai par wo fir kabhee… 🙂

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  3. @ pyaasa sajal…dhanywaad..agar kuch aur achha likhne ki gunjaeesh hai to zaroor bataiyega…aur haan pilani mein bahut se poets hain jo hindi mein likhte hain…bas baat itni hai ki filhaal main hi blog kar raha hoon…@ alpana jidhanywaad…

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  4. प्रतीक ये कविता तो सिर्फ़ एक बहाना हैतुमने सही में छोटे से उम्र में ही जीवन के कडुए स्वाद को पहचाना हैउम्मीद करता हूँ की अब तुम्हारी और भी जीवन से जुड़ी कविताएँ आएँगीऔर हमें ज़िन्दगी को जीने के अहमियत की व्याख्या कराएँगी

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  5. Namaste! Bahut hi sunder likha hai aapne!! Jaankar prasannata hui ki ab tak ye 'naveen' angreji maadhyam shikha ka daur Hindi ke prati lagav samaapt karne mein safal nahin hua aur ab bhi log itni hrdayavedak kavitaayen likhte hein 🙂

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  6. सोच रहा है क्या सिर्फ़ गिनते गिनते ही ज़िन्दगी निकाल दी ?
    काश कभी इन उँगलियों पर उसका नाम भी गिना होता
    जिसने यह गिनती बनाई है,

    baht sundar aur gehen bhav
    padh kar bahut acha laga badhai

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